हल्ला गुल्ला..

 

एक आर्दश कक्षा कैसी होनी चाहिए?

 

इस साधारण से प्रशन ने मुझको बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया और मुझे क्या पता था कि यह प्रशन  मुझको भी अपने बचपन के विद्यार्थी जीवन के आसाधारण बातों से रुबरु करवा देगा। 

 

अभी तक हम अपनी शिक्षा की कढ़ाई में जितने भी तेल मसाले डालकर उसको बेहतर करने के जितने भी नुस्ख़े देते रहें है उसमें अलग-अलग प्रकार से कक्षाओं के विवरण देते रहे हैं। मगर उसमें यह बात सामने आती रहीं है कि कक्षा को और बेहतर कैसे किया जा सकता हैं जिससे छात्रों के अधिगम स्तर में और वृद्धि लाई जा सके। इसके लिए समय-समय पर भिन्न-भिन्न प्रकार की आदर्श कक्षा की रूपरेखा की संरचना होती रहती हैं जिसमें यह सवाल बार बार दोहराते हुए सामने आता रहता हैं कि “एक आदर्श कक्षा कैसी होनी चाहिए”

जब हम एक आदर्श कक्षा की बात करते हैं जिसमें एक शिक्षक अपने ज्ञान की लौ से बाक़ी के दीयों को प्रज्वलित कर रहा हैं।

मगर शायद हमको अपने इस आदर्श कक्षा के सवाल को और स्पष्ट करने की आवश्यकता हो जाती हैं कि आदर्श कक्षा किसके नज़रिये से छात्रों की या शिक्षकों की। 

यदि शिक्षकों की तरफ से देखें तो आदर्श कक्षा वो होगी जिसमें बच्चे शांति से बैठे रहें और शिक्षक के निर्देशों का पालन बिना किसी हल्ले गुल्ले के करते रहें और यदि छात्रों की दृष्टि से देखें तो इसके पूरे विपरीत जिसमें हल्ले गुल्ले के बिना किसी कार्य का आरंभ और अंत नहीं होगा।

इसको एक उदाहरण से समझते हैं,

एक बार जब मैं अपनी कक्षा की ओर जा रहा था तब किसी दूसरी कक्षा में भाषा पढ़ाती हुई एक शिक्षिका ने बच्चों को बोला अगर तुमने कक्षा में बोला या शोर मचाया तो मैं तुमको और पढ़ाऊंगी। 

मेरे मन में ख्याल आया की यदि भाषा पढ़ाना हैं तो बच्चों को बोलना तो पड़ेगा ही। और फिर हल्ला गुल्ला तो होगा ही।

उसी प्रकार यदि विज्ञान सीखाना हैं तो प्रयोग करवाना तो अनिवार्य हैं और प्रयोग के दौरान छात्रों की जिज्ञासा, प्रयोग के दौरान सभी प्रकार की होनी अनहोनी पर तमाम सवाल और विचार तो सामने आएंगे ही और जहाँ विचार आएंगे वहां मतभेद भी हो सकता हैं। मतभेद जहाँ हैं वहाँ हल्ला-गुल्ला तो स्वाभाविक ही हैं।

एक शिक्षक को अपनी कक्षा के संचालन के दौरान हल्ले-गुल्ले पर पूरा नियंत्रण रखने की आवश्यकता तो है ही क्योंकि यह छात्र की भागीदारी तो सुनिश्चित करता ही हैं उसके साथ छात्रों में उमंग की धारा छोड़ता हैं जिसकी असीम ताक़त कभी भी नियंत्रण से बाहर होने पर कक्षा में अव्यवस्था भी फैला सकती हैं।

इसलिए एक शिक्षक को बारीक़ी से मगर नियमित रूप से अपने कक्षा के हल्ले गुल्ले को नियंत्रण में रखने का प्रयास करते रहना चाहिए।

ऐसा कभी नहीं हो सकता कि किसी हल्ले-गुल्ले के बिना कक्षा का संचालन हो सके। यह तो एक चरण हैं अधिगम का जिसके बिना छात्र की उत्सुकता और उनकी समझ को भांप पाना मुश्किल हैं।

यक़ीन नहीं होगा मगर करना पड़ेगा अपनी फेलोशिप के इस  महीने का अनुभव अपने ब्लॉग के द्वारा करने वाला भी कभी बच्चा था। जो कभी स्कूल भी जाता था और जहाँ तक लगता हैं कि आज के सब बड़े लोग भी कभी बच्चे रहे होंगे। मगर जब बड़े हुए तो फिर हल्ला गुल्ला छोड़ सिर्फ बड़ों की तरह सोचने लगे। 

शुभम कुशवाहा

Sparkling minds of tiny tots!

 

I have recently started exploring – Elementary Math Teaching. Though I am a graduate from IIT Mumbai in CSE, but my heart is always into education. So, I don’t have a corporate job experience, but have taught Science to middle schoolers for more than 5 years. The start-up I founded  and ran for 7 years was also around creating Board Games which allowed learning to happen seamlessly. I continue to work in this field and lately Maths has become by area of interest. So, here I was playing some Math games/activities which the Aavishkaar team introduced to me.  It took me sometime before I realized what was going on with my son(4 yrs) and nephew (5 yrs) during these activities.

 

My son liked counting things but often won’t tag the number and the things properly. The Ganit Mala with 200 beads, gave such a real life problem for counting, something he could touch and the quantity was large and the string made sure double counting was not happening. We used to count in the head earlier by saying the number loudly.

 

It took him a while to figure out the pattern that after 29 comes 30…he kept asking me what comes after 39, 49, 59, and caught up the pattern from 69…he said 70 himself. Earlier, I never got this idea of putting actual 200 things for him to count, so he can figure out the boundaries like 19, 29,…99 etc while actually counting, he can literally see the pattern here. Interestingly after reaching 100…he started counting 0,1,2,3 …and refused to say 101, 102….!

 

Well it took a day for him to accept that there are numbers after 100 🙂

As for my nephew, who has been introduced to multiplication and knows all the tables, was counting 1 2 3 4…when I showed him 4 dots in the 10 frames activity. I added one more dot and asked them how many dots…and he said 5. When I asked how did you arrive at it? He said he counted them. When I asked the younger one..he said 5 …and he explained 2, 2 and you added 1 more, so 5! My nephew also got the hang of finding a pattern..and started using it when I added one more dot. 6, 3+3 came the answer from him.

Madhumita 1
10 Frame Activity.

Ganit Mala games with my older one too gave so many opportunities for finding a number….he was forced to break a number into friendly numbers.

 

It was working like a charm.

What I liked about the approach Aavishkaar has towards Maths, it helped me build a REAL view of Maths, Earlier it seemed to be in books only. Here not only was it REAL but I was able to help these 2 boys build this REAL view of Maths in such a short time.

 

A blog by Madhumita.

 

एक कुशाग्रबुद्ध शिक्षक की कक्षा।

 

शिक्षक हूँ! अनुभवों से सीखता हूँ, 

चाहे अपने हों या दूसरों के, 

कुछ अच्छा लगता हैं,

तो मैं रख लेता हूँ।

 

एक शिक्षक का जब नाम लेते हैं तो मन में सबसे पहले जो छवि उभर कर आती है वह एक ज्ञानी व्यक्ति  विशेष, तो कभी छड़ी लिए हाथ में किसी व्यक्ति की बन जाती हैं। मगर किसी व्यक्ति विशेष को केवल उसके विषय ज्ञान के भंडार के आधार पर शिक्षक के पैमाने पर आंकना या समझ लेना शायद थोड़ा ग़लत हो सकता हैं।

एक शिक्षक का विषय ज्ञान उसकी सबसे बड़ी करामति ताक़त तो हैं ही मगर उस ताक़त का किस प्रकार से इस्तेमाल किया जाए जिससे वह अपनी कक्षा के संचालन के दौरान छात्रों को उचित ज्ञान तो दे ही सके उसके साथ वह उस कक्षा के परिवेश को भी नियमित व्यवस्थित करता रहे। जिससे अधिगम का एक उच्चतम स्तर बना रहे।

इस उच्चतम स्तर को बनाने के लिए एक शिक्षक का विद्वान होना तो आवश्यक हैं ही उसके साथ-साथ बदलती हुई इस आधुनिक दुनिया में एक शिक्षक का तीव्रबुद्धि या कुशाग्रबुद्ध होना भी उतना ही आवश्यक हो जाता हैं।

कुशाग्र शिक्षक से अभिप्राय एक चतुर शिक्षक से हैं जो कक्षा के परिवेश को भांप कर अपनी शिक्षण रणनीति बदलता तो रहता ही हैं उसके साथ-साथ छात्रों को उपयुक्त दिशा निर्देश द्वारा उनकी भागीदारी भी नियमित रूप से बढ़ा घटा के अधिगम करवाता रहता हैं।

इस माह में अवसर प्राप्त हुआ ऐसे ही कुछ कुशाग्र शिक्षकों की कक्षा में जाने का। जहाँ अलग-अलग शिक्षकों की कक्षा के संचालन की प्रक्रिया तो देखी ही उसके साथ भिन्न-भिन्न प्रकार की तरक़ीबों से भी परिचित होने का अवसर प्राप्त हुआ।

“शिक्षिका जो छात्रों को दिमाग लगाने पर मजबूर कर देती हैं”।

एक शिक्षिका ऐसी भी मिली जो अपने कक्षा में पढ़ाते समय प्रश्नों की झड़ी को इस तरह लगाती थी कि छात्रों की रुचि कभी खो नहीं पाती थी और छात्र पढ़ते हुए ऊब भी न जाए इस बात का भी अनुमान वो भली भांति लगा लिया करती थी। दरअसल वह प्रश्नों को पूछने के सफर को कुछ आसानी से मुश्क़िलात की तरफ इस तरह ले जाया करती थी की छात्रों को इसका बोध भी नहीं हो पाता था और वह अपनी जिज्ञासा को कभी खो नहीं पाते थे। इससे छात्रों की बौद्धिक स्तर का विकास भी नियमित रूप से बना रहता था।

” ग़लतियों को जशन मनाना सीखो”।

ग़लती! किसी भी काम में ग़लती हो सकती है यह एक ऐसा शब्द और एक ऐसी चीज़ है जो आने वाले क़दम को ठहरा देती हैं और चलते हुए कारवां को रोक देती हैं, मगर कक्षा में यदि इस चीज़ का जशन मनाया जाए तो बहुत कुछ सीखा भी देती हैं। शिक्षक को प्रत्येक छात्र को ग़लती करने पर प्रोत्साहित करते रहना चाहिए और एक दिन ख़ुद वह छात्र अपनी ग़लती को सही कर लेने में सक्षम हो जाएगा।

कक्षा में पढ़ाते समय अक्सर देखने को यह बात मिल ही जाती हैं यदि कोई छात्र ग़लती करता है या उससे पूछे गए सवाल का जवाब ग़लत होता है तो ऐसे में उसका पूरी कक्षा में मज़ाक बनता है और वह शर्मिंदगी से शराबोर होकर फिर कभी उत्तर देने की चेष्टा नहीं कर पाता मगर यदि एक कुशाग्र शिक्षक कक्षा में हो तो वह उसके ग़लत जवाब को भी किसी और संदर्भ में सही बताते हुए उसे अगली बार जवाब देने के लिए प्रोतसाहित कर ही देता हैं।

“जो आलस्य भी चालाकी से करता हो”।

एक अच्छा शिक्षक आलस्य भी चालाकी से करता है, वो तरीक़ा अपनाता है की शिक्षण सामग्री को बच्चों के समूह बनाकर सही तरीक़े से बाँट दे। सही समूह से तात्पर्य प्रत्येक छात्र को इस तरह से समूह में पिरोया जाए जिससे वह मिलकर काम कर सकें और उसके इस्तेमाल का सही निर्देशन देकर अपना काम सरल बना ले। फिर बस उसको घूम-घूम कर देखना होगा कि सब समूह सही-सही और मिलकर काम कर रहे हैं या नहीं अर्थात फैसिलिटेट करने तक ही अपना काम सीमित रखे।

क्या एक समझदार शिक्षक वह है जिसके पास सारा ज्ञान का भंडार है? अपनी इस परिभाषा को मैं आज बदलकर एक नई समझ देता हूँ “जो नए-नए हत्कन्डो से शिक्षण को सहज सरल कर दे वह एक समझदर शिक्षक हैं” जिसके लिए वह अपने अहंकार से परे दूसरे की कक्षा को देखे महसूस करे और उसको अपनी कक्षा में अपनाए वह एक समझदार शिक्षक है।

इस महीने ऐसे ही कुशाग्र शिक्षकों की कक्षा को देख बहुत सीखा जो अच्छा लगा, उसको अपने शिक्षण के थैले में रख लिया और इस्तेमाल कर लिया। ऐसे पैंतरे शायद किसी किताब में मिलें न मिलें या कोई बताए या न बताए, मगर सिर्फ अपने साथियों की कक्षा को देख उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला।

इसको करने के लिए कुछ अधिक कठिनाईयों का सामना भी नहीं करना पड़ा बस अपने चश्मे को उतार कर कक्षा को नंगी आंखों से देखने भर का समय लगा। ऐसा कोई भी यदि करे तो फिर वह ऐसे-ऐसे पैंतरे सीख लेगा जो शिक्षण प्रक्रिया को और लचीला बना देने में सहायक हैं।

सभी को कामयाबी अच्छी लगती हैं। हम सब कामयाब होना चाहते हैं और एक शिक्षक की कामयाबी -असल कामयाबी तब बनती हैं जब उसका विद्यार्थी कामयाब होता हैं। एक विद्यार्थी को कामयाब बनाने के लिए इतनी नाकामियों से उसकी परीक्षा लेने के लिए शिक्षक को थोड़ा तो तीव्रबुद्धि बनना पड़ेगा। उसको उसकी ग़लतियों से परिचित भी करवाना पड़ेगा एवं  और ग़लतियाँ वह करे, उससे सीखे इसके लिए भी उसको प्रोत्साहित करते रहना पड़ेगा।

 

शुभम – आविष्कार फेलो।

 

शिक्षक शिविर: एक बेहतर शिक्षक बनने के लिए।

 

पिछला महीना शिक्षकों के प्रशिक्षण शिविर का हिस्सा बनते हुए बीता। दो शिविर, हमारी कक्षा और आधार गणित आयोजित हुईं। एक 28 सितंबर से 2 अक्टूबर, दूसरी 4 अक्टूबर से 8 अक्टूबर।

इन शिविरों में भी देश के अलग अलग भागों से व्यक्ति आये। तमिलनाडु, दिल्ली, मुम्बई, हरियाणा जैसे राज्यों से अपनी विविधता के साथ आये।

शिक्षा के क्षेत्र मे अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे जुझारू, अनुभवी व्यक्ति इन शिविरों का हिस्सा थे। कुछ मेरे जैसे नौसिखिये थे, कुछ पदच्युत हुए व्यक्ति, तो कई लोग सालों कॉर्पोरेट मे अपना समय बिताने के बाद शिक्षा मे अपना योगदान अच्छे से दे पाने के लिए आविष्कार मे नए हुनर सीखने को आये थे। इन शिविरों की शुरुआत ऐसे महानुभवों के साथ हुई।

 

ओजस मे बैठे 30 शख्श गुनगुनी धूप का आनंद लेते हुए भिन्न (गणित के अध्याय) को नए अंदाज़ में सीख रहे थे। बीच बीच में ठंडी हवा स्पर्श करते हुए गुज़र जाती, ठंड सूरज की गर्माहट को पल भर के लिए ग़ायब सा कर देती और आने वाली ठंड का एहसास करा रही थी।

 

ऐसे शख्सियतों के साथ गणित के किसी विचार पर चिंतन करने में मज़ा आता।

मेरा पहला दिन काफी घबराहट भरा था। जबकि सिर्फ बैठ कर सुन्ना और बहस का हिस्सा बनना ही था। अगले ही दिन इस पर काम किया और लोगों से घुलना मिलना शुरू किया।

इन कैंपों मे सार्थक बहस का बेजोड़ नमूना देखने को मिलता। शख्श अपने विचार रखते, और असहमति भी जताते। पर हम बातचीत का हिस्सा कम ही होते, सुनते ज़्यादा। 

 

इस पर सरित सर ने एक रोज़ हमलोगों का उत्साहवर्धन किया कि आप लोगों को दूसरों के लिए आदर्श होना चाहिए, आपको चर्चा का ज़्यादा से ज़्यादा हिस्सा होना चाहिए। कभी शिविर में चर्चा हो और उससे जुड़ा कोई भी विचार आ रहा हो तो अपनी बात रखो, ज़्यादा से ज़्यादा ग़लत ही तो हो जायेगा। कोई शख्श अपनी बात रख रहा है और आप उससे सहमत नहीं तो आप ऐसे कह सकते की मुझे ये चीज़ समझ नही आई, मेरे विचार से इसका मतलब ऐसा होता है। क्या आप इसे थोड़ा और समझायेंगे। यह कुछ अच्छे तरीक़ेकार होते है अपना दृष्टिकोण रखने के लिए।

 

कोई सेशन ले रहा है, बीच में आप कुछ पूछना चाहते तो उसका सम्मान करते हुए पूछो, “कि क्या मैं यहां पर एक प्रश्न पूछ सकता हूँ, पर दूसरे को ग़लत ठहराने के उद्देश्य से प्रश्न कभी नही पूछना है।”

 

दो दिन बाद ही ठंड ने अचानक ही अपना रुख़ बदल लिया। ठिठुरती हवा ने सभी को शाल, सदरी ओढ़ने को मजबूर कर दिया। ऐसी ठण्ड के बीच चर्चाएँ करने का अलग ही मज़ा आता। गणित चर्चा ऐसे होती कि ठण्ड का ख्याल ही नही आता।

 

गणित चर्चा के दौरान एक बात पकड़ में आई कि हमारे दिमाग़ में हर एक नंबर का चित्र होता है। ये चित्रण हमारे दिमाग में जितने अच्छे से होगा, उस नंबर को हम उतनी ही शीघ्र समझ पाएंगे। जैसे कि हम पासे के पांच डॉट जहां भी देखते हैं हमे देखते ही पता चल जाता है कि ये 5 है, हम उसे गिनते तक नहीं क्योंकि 5 का चित्र हमारे दिमाग में अच्छी तरह बन चुका है। मैंने कक्षा में देखा था कि नेहा गिनतियाँ तो गिन लेती है पर वो ये नहीं जानती कि किसे एक कहते और किसे दो कहते हैं। उसे छोटे मोतियों से माला बनाने को कहता तो एक मोती को उठाकर डेस्क पर रखती फिर कहती एक। इस तरह गिनती शुरू करती पर 5 तक पहुँचते पहुँचते वो कभी दो मोतियों को एक बोलती तो कभी तीन मोतियों को एक कहती। उसने गिनतियाँ तो याद कर ली थीं पर उसने उन्हें पहचानना नही सीखा था। उसे गिनती की पहचान कराना हमारा काम था। 

चाय और खाने के दौरान शिविर में आये व्यक्तियों से बातचीत होती। कई बहुमूल्य बातें पता चलती जैसे कि बच्चे के ग़लत उत्तर पर उदास मत हो और सही उत्तर मर मुस्कुराओ मत, सामान्य रहो ताकि वो नए तरीक़े से सोचना बंद न करे।

 

अब मैं 23 साल का हो गया हूँ परंतु अब जाकर मैंने सीखा की गणित में भाग किस तरीक़े से किया जाता है। सही तरीक़े से भाग देना सीखा। अब-तक जैसे सीखा था वो गलत था, अब मेरा दायित्व है कि दूसरों को सही सिखाया जाए।

 

विज्ञान के भी कई सत्र हुए। उन्हीं में से एक विद्दयुत का था। ये अध्याय मुझे ठीक से नही आया। इसे फिर से समझना है। कैंप के दौरान चर्चा इतनी गहन हो जाती कि चाय का समय भी इसी मे समाप्त होने को होता। समय सीमा समाप्त होने के बाद भी कोई बिग-बैंग पर चर्चा करता दिख जाता तो कोई अणुओं पर।

 

कैंप मे बदलते सत्रों के जैसे मौसम भी बदलता रहता, एक रोज़ चारों ओर से बादलों ने घेर लिया, बादल सर्दियों के कोहरे की नमी महसूस कराते हुए हमारे चेहरों से टकराते हुए आगे की ओर बढ़ते जा रहे थे, कुछ पल को हमारा ध्यान भटकाते जा रहे थे। कुछ देर बाद ही हमारे बीच (ओजस में) और आसपास बादलों का हजूम सा लग गया। ज़ोरों की बारिश होने लगी। इस बीच एक प्रश्न उठा कि बादल तो ओजस के अंदर भी है तो यहां क्यों नहीं बारिश हो रही है? इस तरीक़े से हमारे बीच मंथन होता रहता।

 

क्रिटिकल थिंकिंग पर चर्चा हुई। सभी ने अपने विचार रखे की क्रिटिकल थिंकिंग क्या है? किस तरीक़े से हम अपनी क्लास के बच्चों में इस चीज़ का विकास करें।

कक्षा में कैसे प्रश्न पूछने चाहिये की बच्चे गहन सोचना सीखे? 

जो लोग आये वो कितने लाजवाब थे। मैं अपने जीवन में पहली बार इतने सहज और विनम्र लोगों से मिला, और उनसे बातचीत हुई। उन्हीं मे से एक शख्श था श्याम, जो तमिलनाडु से था, उनकी समझदारी भरी बातें मुझे छू गई। उन्होंने सिखाया कि खुलकर रहो, अपनी बातें छुपाओ नहीं। किसी को पता चल जायेगा तो क्या हो जाएगा। जितना लोगों से अपनी बातें साझा करोगे, उतना ही वो तुमसे करेंगे। और उतना ही विश्वास बढेगा। हो सकता है तुम कुछ बातें न बताना चाहो पर फिर भी बात करो। उसने अपनी रहस्यमयी बातें मुझे बताई जो मै कभी किसी को नही बताना चाहूँगा, इसके बाद बातों का आदान प्रदान शुरू हुआ। मैंने अपनी समस्याएं पूछीं, उन्होंने अपनी तरफ से उस पर सुझाव दिए।

 

उन्होंने समझाया कि किस तरीक़े से तुम अपनी फ़ेलोशिप को बेहतर बना सकते हो, क्योंकि ये सिर्फ तुम्हारे विकास के लिए ही है।

 

इन सभी लोगों का तहे दिल से शुक्रिया जो इस शिविर का हिस्सा बनने को आविष्कार आये, स्वयं सीखने और सिखाने।

दिव्यांशु (आविष्कार फैलो)

 

मेरी कक्षा, बच्चे और विकास की ओर एक और क़दम।

अपनी कक्षा के बच्चों, विद्यालय, उनके व्यवहार के बारे मे कुछ बातें साझा करना चाहता हूँ। जैसा की पिछले अंक में बताया था कि बच्चे बात सुनते तक नहीं थे, पर अब उनमें बदलाव दिखता है। अब बिहैवियर मैनेजमेंट का असर बच्चों पर दिख रहा है। अब बच्चों को पता है, भैया किस तरीक़े से काम करते हैं, किस बात पर ग़ुस्सा हो जाते है, उन्हें पता है। वह बच्चे बार बार कहने पर भी सुनते नहीं थे, अब कक्षा में मात्र प्रवेश करते ही शांत बैठ जाते हैं। देखकर ख़ुशी होती है। शोर होने पर मेरे बस चुपचाप खड़े हो जाने पर कहने लगते कि हमे पता है कि भैया नाराज़ है, चुप रहो।

यह जानने के लिए कि आज भैया क्या कराएंगे, आवाज आती कि भैया आज क्या लाए हैं, भैया वो वाले डिब्बे लाए हैं ना?

 

उन्हें शुरुआती 5-7 मिनट खेलने में बड़ा अच्छा लगता है। परन्तु मुझे आश्चर्य होता है कि अब वह मुझसे एक बार भी नहीं कहते कि भैया खिलाओ, बस देखते कि भैया क्या कराएँगे? जब कभी खेल नहीं कराता तो वह जिद नहीं करते कि खेल खिलाओ, वह नहीं दूर भागते पढ़ाई से क्योंकि उन्हें पता है कि आगे जो कुछ भी भैया करेंगे उसको करने में भी मजा हि आएगा।

कक्षा में प्रवेश करने के बाद जब कहता कि बीच में आ जाओ, तो वो सब खुशी से दौड़कर आकर एक दूसरे से कंधे से कंधा मिलाकर छोटा सा गोला बना लेते, पूछते कि भैया आज कौन सा खेल खिलाएंगे?

कक्षा में विविधता है, कोई बहुत बोलता है, कोई बहुत कम बोलता है, कोई चुपचाप होकर अपना काम करता है तो कोई शोर, कोई लड़ाई करता है तो कोई अपने में खोया रहता है। तो कभी सब मिलकर मुझपर हँस लेते।

कभी आपस में झगड़ा करते तो कभी जूते का फीता खुल जाने पर एक दूसरे के फीते बाँध भी देते।

जैसे कि उन्हें जोड़ना सिखाते वक्त मैं बच्चों से पूछता कि कौन बताएगा 15 नंबर को दो नंबर की सहायता से कैसे बनाया जा सकता है?

आवाज़े आतीं कि भैया मैं, भैया मैं…। तो कोई चुपचाप हाथ खड़े करे रहता और कोई चुपचाप बैठा रहता।

पंकज जो अत्यधिक चुलबुला है। कहता, “मुझे तो आता है, भैया मुझसे पूछो।”

“पंकज ने हमारे बनाए नियमों का पालन किया”, मैंने पूछा।

“नहीं। भैया बोलने से पहले हाथ ऊपर नहीं किया”, कनिका ने हाथ ऊपर रखते हुए बोला।

पंकज आप आओ बोर्ड पर लिखो आकर।

5 जमा, 5 जमा, 5.

शिवम् ,”10 जमा 5″। “सात जमा 7”, शान्या।

किसी को दूसरे तरीक़े से लिखना है या फिर कुछ सुधार करना है तो बताओ।

शिवाली, “6 जमा 6 जमा 3″।

“ऐसे नहीं होता है मुझे पता है, भैया आप मुझसे पूछते ही नहीं हो”, पंकज।

“7 जमा 7 जमा 1 होगा”, पंकज।

“भैया मुझे यह नहीं करना है, मुझे धागे वाला दो, या कुछ और दो”, नेहा कहती।

नेहा अधिकतर यही कहती, जब कभी मैं नेहा के लिए अलग से सामान नही ले जाता तो मुझे उसे यही दिलासा देना पड़ता कि बेटा बाक़ी लोग भी यही कर रहें हैं, आप भी कोशिश करो।

ऐसे ही किसी रोज़ एक एक्टिविटी करवा रहा था तो उसमें बच्चों को गिनती गिननी थी नेहा ने फिर यही कहा कि मुझे भैया यह नहीं करना है तो मैंने कहा कोशिश करो। आपको 20 तक गिनती आती है इसलिए आप यह कर लोगे। इस पर उसके बगल वाली बच्ची बोली कि भैया इसको गिनती नहीं आती है इसको मत करवाओ कुछ और दे दो। इस बच्ची की बात में इतना विश्वास था कि जैसे कई दफ़ा ये बात नेहा को बोली जा चुकी है।

इस पर नेहा बोली, “हां भैया, मुझे नहीं आती है”।

ऐसे ही इतने ही बच्चे उपेक्षित कर दिए जाते हैं। मजबूर किए जाते हैं मानसिक रूप से कमज़ोर होने और खुद को कमज़ोर समझने के लिए।

 

उम्र में मेरे स्कूल की अध्यापिका बच्चों के समान है, उनका व्यवहार भी हमारे प्रति अच्छा है।

पर एक ऱोज उनका व्यवहार ठीक नहीं लगा। जब वो नेहा के सामने ही कहने लगीं, “यह कमजोर है, पता नहीं क्या बात है तीन बार कक्षा दोहरा चुकी है। अभी तक यह 20 तक गिनती ही नहीं पहचान पाती”। नेहा की दीदी जो सामने ही बैठी थी, से पूछा गया कि इसको पढ़ाती हो कि नहीं। कहने लगीं कि इसके घर वालों से इतनी बार कहा कि इसे किसी स्पेशल स्कूल में भेजो, पर मां-बाप उसे ख़ुद से दूर ही नहीं करना चाहते हैं।

कक्षा के दौरान मैंने देखा कि वह बच्ची उत्तर जल्दबाजी में देती, कुछ भी बोल देती। जैसे कि जल्दी से छुटकारा पाना चाहती है।

“3 जमा 2 कितने होते हैं”, पूछता।

वो बोलती, “7”।

नहीं, सोच कर बताओ। “भैया 6, नहीं 8…..”, कहती।

इस तरह नंबर पर नंबर बोलती चली जाती और मेरे चेहरे की ओर देखती कि भैया कब पूछना बंद करेंगे?

पर जब ज़ोर देकर कहता कि ऐसे नहीं सोच कर बताओ। फिर पूछता कि आपको हमने तीन टोपियाँ दी फिर दो और दी तो आपके पास अब कुल कितनी टोपियाँ हो गई। तब बता देती कि पाँच।

नेहा एक दिन अपनी कॉपी मे 1 से 100 तक लिखी गिनतियों को दिखाते हुए बोली कि ये मेरी माँ ने लिखाई है। कक्षा की अध्यापक भी समय समय पर छुटपुट गिनतियों का अभ्यास उसे उसकी कॉपी मे करवाती रहती हैं।

5 सितंबर को विद्यालय में छोटा सा कार्यक्रम था, बच्चों ने तरह तरह की प्रस्तुतियां दी। उस दिन नेहा बहुत खुश थी, झूम रही थी गानों पर। उस खुशी मे वो दुसरे छोटे बच्चों को दुलारती। हो सकता है वो किसी अन्य काम को बेहतर तरीक़े से कर सकती हो, डाँस, खेल,……….

हमें अध्यापक, बच्चों के साथ अच्छे संबंधों के साथ-साथ बच्चों के अभिभावकों से भी मिलना होता है। जिससे कि बच्चे के विकास में और भी योगदान दे सकें।

इस तरह मैं अपनी इस फ़ेलोशिप के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुँचा हूँ कि बच्चों के घर जाया जाए, अब बस नेहा के अभिभावकों से मिलने की देरी है।

उम्मीद करता हूँ मैं नेहा को इस मुश्किल दौर से बाहर निकाल पाउँगा..

छोटू का सफर

मेरी आविष्कारकों की नगरी आविष्कार की यात्रा की शुरुआत दिल्ली से निकलकर हिमाचल के एक गांव कंबाड़ी से होती हैं। शुरुआती पहले हफ्ते में एक कैम्प आयोजित था जिसका नाम पाई-सफारी था। जिसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं गणितीय समझ के विकास को प्रोहत्साहन तथा मंचन विभन्न प्रकार की क्रियाओं प्रयोगों द्वारा किया जा रहा था। यहीं पर मेरी मुलाक़ात छोटू से पहली बार होती हैं। छोटू बड़ा ही साधारण सा मालूम पड़ता हैं मगर हैं बड़ा ही असाधारण। इस प्रकृति में फैले कण-कण (छोटू) के बारे में मैं जब जान रहा था तब अनुभूत होता है इस नगरी में मैं जहाँ अचानक से मैं आ पहुँचा हूँ। यहां का वातावरण ऐसा निकलेगा जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। पुष्टि के लिए मैंने अपनी आँखें भी मींजी, यकीन भी हो गया था। प्रत्येक दिन विज्ञान एवं गणितीय सोच को अपने अंदर की प्रकृति में महसूस करते हुए एक माह बीतता है। और अब बारी थी जो पाया है, जो छोटू के बारे में समझा है, जो उसके बारे में सीखा है, उसको आगे देने की, बच्चों को पढ़ाने की।

 

कक्षा में पढ़ाने की प्रक्रिया आरंभ हुई। पढ़ाना बोलना शायद सही नहीं होगा इसलिए कक्षा में सीखने की प्रक्रिया बोलता हूँ। गाड़ी में थे कुछ आधा घण्टे का सफ़र कर रहे होंगे और वो सफर मेरा suffer जैसा था। पढ़ाया तो मैंने पहले भी हैं किंतु वह कक्षा एक तरफा जैसी समझ सकते हैं क्योंकि उसमें शिक्षक ही करके समझाता था मगर आविष्कार की पहल कुछ और ही हैं। यहां शिक्षक का कार्य केवल पढ़ाना न रहकर एक सरलीकृत करने वाला भी हैं। जो बच्चों को एक माहौल प्रदान करें जिसमें वह स्वयं प्रयोगों-अनुप्रयोगों द्वारा तमस को बुझा कर ज्ञान का प्रकाश मन में जला सके तथा यहाँ पढ़ाने से ज़्यादा सोचना और प्रशन पूछने पर ध्यान एवं प्रोहत्साहन दिया जाता हैं।

तो पैर थोड़े कांप रहे थे दिल की धड़कनें बढ़ी हुई थी जैसे-जैसे मैं उस विद्यालय के नजदीक जाता जा रहा था, रास्ता कम होता जा रहा था। परेशानियों में थोड़ा डूबे हुए थे। मन में बेचैनियां भरी हुई थी। फिर बस ध्यान केंद्रित किया अपने ज्ञान पर जो अभी पिछले महीने सीखा हैं, जिसमें कुछ भी नाटकीयता का भाव या ऐसी कोई बात नहीं थी जिसे झुठलाया जा सके क्योंकि इसमें सत्य क्या है, असत्य क्या हैं, इसकी खोज बच्चों को करनी हैं मुझको बस उस सत्य तक पहुँचाने में सहायता करनी हैं। कक्षा में गया जहाँ पर नौवीं और छटवीं कक्षा एक साथ ज़मीन पर दरी बिछाए बैठी हुई थी। हम वहाँ गए नौवीं कक्षा वालों को सातवीं कक्षा में भेज कर अपनी छटवीं कक्षा को पढ़ाने का कार्य शुरू करने में जुट गए।

कक्षा से एक परिचय लेते हुए सबके नाम पूछे और फिर उसके बाद उनके नामों के अर्थ के बारे में पूछते और बतातें हुए एक अपने और कक्षा के बीच ताल मेल या रिश्ता सा कुछ बनाने की कोशिश कर रहा था मैं, जहाँ तक लगता हैं काफी हद तक सफल भी रहा। उसके बाद बातों के सिलसिले से कक्षा अध्यापन की ओर कदम बढ़ाते हुए पूछा,” तुम लोग विद्यालय क्यों आये हो?” तो मुझे पता नहीं था की सब से पढ़े, लिखे और समझदारी वाले जवाब सुनने को मिलेंगे। जवाब कुछ इस प्रकार के,”पढ़ने के लिए सीखने के लिए और किसी ने कहा “नौकरी मिल जाए इसके लिए” ज़वाब सुनकर मैं थोड़ा अचरज में था। सोच रहा था की ये जन्म से जन्मे कलाकार बच्चे, न जाने क्यों अपनी उम्र से पहले ही बड़े हो जाते हैं। खैर मैंने फिर आगे बोला की तुममें से कोई मजे करने नहीं आया क्या? क्योंकि स्कूल तो इसलिए जाते हैं और मजे कर सकें, नए दोस्त बना सकें। इस तरह की बातों को मिल-मिलाकर करते हुए मैं छात्रों को मजे करने के तरीके बता रहा था और फिर शिक्षण पूर्व निर्धारित अपनी पेपर फाड़ने वाली क्रिया पर आ गया (जो कि मेरे आज के शिक्षण का अहम हिस्सा था)।

 

क्रिया कागज़ फाड़ने की प्रक्रिया सही चल रही थी बच्चों को उसका सबसे छोटे अंश का नामकरण करना था जो उन्होंने कर दिया। नाम छोटू और पिद्दु रखा गया। ये छोटू वही हैं जिसे विज्ञान जगत में भयंकर नामों से जाना जाता हैं और भिन्न-भिन्न परिभाषाओं द्वारा परिभाषित करके उसको मॉलिक्यूल या अणु के नाम से संबोधित किया जाता हैं। परन्तु आज इस कक्षा में छात्रों ने उसको अपनी सरल भाषा में नामित कर दिया था। अब नामकरण के बाद थी बारी उसकी प्रकृति के बारे में जानने की। कुछ क्रिया द्वारा पता चला कि अपने छोटू के पास तो दो बड़ी ही आकस्मिक ताकतें हैं। और वो हैं खींचव की और हलचल की। एक छोटू दूसरे छोटू को खींचने की पूरी कोशिश में लगा रहता हैं और वह छोटू हिलता ढुलता भी रहता हैं।

 

मैं छात्रों को विभिन्न प्रकार के छोटुओं के बारे में बता रहा था और अगरबत्ती द्वारा या कुछ अन्य प्रयोगों द्वारा छोटुओं की कल्पना को हकीकत बना रहा था। छोटू हवा का हो या पानी का उनके बारे में बता ही रहा था तभी मैंने बोला, पानी का सबसे छोटा हिस्सा अर्थात पानी का छोटू “बूंद” हैं? तभी एक छात्रा शगुन ने बोला नहीं सर, बूंद में भी कई छोटू होते हैं। वाह! क्या बात कही। यहाँ तक कुछ-कुछ समझ आया कि बच्चों को छोटू की कुछ-कुछ नहीं बहुत समझ हो गयी हैं। आज दिमाग को ये एहसास भी हुआ कि सबसे ज़्यादा दिल को सुकून तब मिलता हैं जब तुम्हारे पढ़ाए गए पाठ को इस तर्ज तक समझा गया हो। फिर छोटुओं की समझ का कारवां आगे बढ़ता हैं और उनकी दिनचर्या में इस्तेमाल होने वाली सभी वस्तुओं को ब्लैकबोर्ड पर लिख एक सूची बनाकर उनसे एक बार परिचय किया जाता है और किस- किस्म या किस प्रकृति के छोटू हैं उनकी भी बात करी जाती हैं। जिसके बाद उस सूची को एक विशेष क्रम में कैसे व्यवस्थित करना हैं, वह छात्र करने में स्वयं लगे होते हैं। उस दौरान विद्यालय की घण्टी भी बज जाती हैं मगर सभी बच्चों का ठहराव था अपनी जगह पर। क्योंकि अक्सर घण्टी लगने पर सब भागते हैं। मगर जो मेरी आँखों के सामने बच्चे थे वो जैसे कहना चाह रहे हों कि सर और कुछ करके दिखाओ हम पता लगाने की कोशिश करेंगे और छोटू के बारे में जानने की कोशिश करेंगे।

उम्मीद करता हूँ की आने वाले वक़्त में और सीखूंगा और सिखाऊंगा भी।

Impact bubbles in a Week

During the 3 day workshop for Primary Mathematics teachers, Aadhaar Ganit, in April 2019, I did my fourth teacher training session. It was although the first time that I saw the impact of my work directly. For the session on Number Sense, I researched games, a few of which came from my own experience as a student. The attitude that has now been built in me over my time in Aavishkaar, pushes me to find the best methods to teach any topic. Thus I was able to connect my own experiences with the knowledge present already. The Odd-Eve Hand Cricket game that I used to play in school, was what I connected with the initial number sense and subtilizing. For Fraction, we developed a new hand clap game on the spot. I had thought of representing area, volume, set and length through another activity last year. And these 3 things were used by the teachers who participated, immediately as soon as they went back! I cannot explain the happiness that flooded over me when I saw pictures of the participants using the games in their classrooms in much better ways so quickly. This was the first time I felt like being from a humanities background was in fact NOT making me a mismatch at Aavishkaar!