पढ़ना, साझा करना, चर्चा करना।

मैं हमेशा से ही ऐसी चर्चाओं का हिस्सा होना चाहता था, जिसमे सभी अपनी बात रखें और फिर एक निष्कर्ष पर पहुंचे जो सभी के लिए लाभदायक हो। ऐसी छोटी सभायेँ जहां पर लोग किसी महत्वपूर्ण विषय पर अपने विचार रखें उनका आदान प्रदान करें।

बहुत सी किताबों मे पड़ा था की किस तरह से कोई इंसान छोटी सभाओं मे हिस्सा लिया करता था, या फिर अपनी मित्र मंडली के साथ गुफ्तगू करके उसने अपनी जिंदगी को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दुनिया के कई समाजवादी नेताओं, वैज्ञानिकों, कवियों में और भी परिपक्वता आई जब वो ऐसी सभाओं का हिस्सा हुये जिसमे वो अपने विचारों को साझा करते थे। उन पर चर्चा करते, उन्हे और भी परिपक्व बनाते जो ख़ुद के और दूसरे के विकास के लिए लाभकारी होती। 

समाज-वादियों द्वारा एक कमरे मे बैठकर सामाजिक ख़ामियाँ पर चर्चा करना या फिर कई साहित्य पसंद लोगों का नुक्कड़ की दुकान पर चर्चा करना उनकी जिंदगी मे काफी उपयुक्त रहा। आप एक ऐसी जगह की कल्पना तो करो जहां पर आप अपने साथियों के साथ बैठकर अपने विचार साझा करते हो। जहाँ आप पक्ष, विपक्ष दोनों का सामना करना सीखते हो। बात करते वक़्त आप विपक्ष का सामना शांत रहकर करना सीखते हो। शीर्षक जिसके बारे मे आप जानकारी रखते हो और दूसरे उसे सुनते हैं, उसके बाद अपने तर्क से प्रश्न करते हैं। आप अपने तर्क से कोशिश करते हो उनके प्रश्नों का जवाब देने की, दूसरे भी अपने विचार रखते हैं। ऐसी जगह जहाँ सिर्फ जवाब देने की बात ही नही है, दूसरे उस तथ्य पर कैसे सोचते हैं, चिन्तन- मंथन, तर्क का ये सिलसिला चलता है। हो सकता है सभी बातें ठीक न हो पर उसमे से कुछ बातें ज़रूर आपकी समझ मे बढ़ोतरी तो करेंगी ही साथ ही साथ आप के विचारों मे मज़बूती भी लाएंगी।

हर गुरूवार को हम सब साथ मे बैठकर एक किताब को पढ़कर उस पर चर्चा करते हैं। इस ‘बुक रीडिंग इवैंट’ को सुनियोजित तरीक़े से आयोजित करने की ज़िम्मेदारी मेरी ही थी। मैं अपनी तरफ से पूरी तैयारी के साथ जाता था। सच कहूँ तो इस बुक रीडिंग इवैंट से मुझे काफी लाभ मिला। न केवल विषयात्मक ज्ञान नहीं बल्कि व्यावहारिक ज्ञान भी।

इस दौरान हमने तरह तरह के लेख, किताबें पढ़ी। किसी किताब ने विषयात्मक ज्ञान बढ़ाया तो किसी ने दार्शनिक बात को समझने के तज़ुर्बे दिए तो अन्य ने शब्दों, तर्किक शक्ति को और भी सशक्त बनाया। 

ऐसी ही एक किताब है, दिवास्वन। एक ऐसी किताब जो शिक्षा मे बदलाव के लिए उठाए गए क़दमों के बारे मे बताती है, किस तरह से गीजू भाई एक सरकारी विद्यालय की एक कक्षा मे बदलाव लाए। किस तरह से उन्होने व्यक्तिगत विकास के योगदान के लिए क़दम उठाए। जैसे कि दिन-भर मे बच्चों ने जो कुछ किया उसको कॉपी मे लिखना, हर एक दिन के बारे मे लिखना। जिस लक्ष्य की ओर जाना चाह रहे हैं उसमे क्या परेशानियाँ आ रहीं हैं, उनको दूर करने के लिए सही क़दम उठाने का साहस रखना। ये बातें मुझे इस उपन्यास को पढ़कर पता चलीं।

दिवास्वप्न के बाद हमने (होप फ़ॉर दा फ्लावर्स) ‘आशा के फूल’ नामक किताब पड़ी। जोकि एक कीट पर केन्द्रित थी, जो ये बताना चाहती थी कि ज़रूरी नही कि दुनिया मे जो कुछ भी दूसरे लोग कर रहे हैं तुम भी वैसा ही करो। हो सकता है तुम एक नए रास्ते कि खोज करो, ऐसी जो शायद और भी महत्वपूर्ण हो। एक कीट के तितली बनने की कहानी, जो भीड़ का हिस्सा बनकर किसी काल्पनिक ऊंचाई पर नही जाना चाहता था। इसे पढ़ने के दौरान हम लेखक द्वारा दिये गए तर्क पर अपने अपने मत रखते थे। कई बार हम लेखक से असहमत भी होते। प्रश्न भी उठते कि क्या उस आदमी का जीवन व्यर्थ है जो किसी ऐसी दिशा मे जा रहा है जिसे किसी अन्य ने बताया है और उसने अपनी आँखों से भी देखा है कि इस रास्ते पर जाने से उसे उसका मन-चाहा लक्ष्य मिलेगा। तब किसी अन्य द्वारा बताया गया रास्ता कैसे व्यर्थ हो सकता है।

ऐसे ही एक अन्य उपन्यास हमने पड़ा था जिसका नाम था लिटल प्रिंस यह भी एक कल्पना पर आधारित उपन्यास है। जिसमे कि एक बच्चा दूसरे ग्रह पर पहुँच जाता है। वहाँ पहुँच कर परिस्थितियां किस तरह से बदलती हैं। और हमने ही अपने आसपास ऐसे बेवजेह के नियम कानून बना रखे हैं जिसका कोई अस्तित्व ही नही होना चाहिए था। ये एक ऐसी पुस्तक थी जो दार्शनिकता से भरी पड़ी थी, इसे दोबारा पड़ने की ज़रूरत थी।

समय बीतता गया और इस बुक रीडिंग अभियान मे बदलाव भी आने लगे। नाम बदलकर ‘पड़ना, साझा करना, चर्चा करना’ हो गया। हम अब एक किताब पर चर्चा करने के बजाय सभी लोग एक छोटा सा लेख पढ़कर आते और उसे साझा करते। हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का 10 मिनट का समय मिलता। उस दौरान हम उससे प्रश्न करते, एक दूसरे के साथ चर्चा करते। उस बात को मानने से पहले तर्क करते तब उस बात को हम मानते। इस दौरान हमने कई विषयों पर अपनी समझ बेहतर की जैसे कि हमारे शरीर के सूक्ष्म-जीव, विज्ञान पर अविश्वास, तथ्यों पर अविश्वास, हम पेट्रोल का इस्तेमाल ही क्यूँ करते हैं गाड़ी मे, ऐसी बहुत सी बातों पर समझ बेहतर हुई।

इतना सब कुछ होने के बाद हमे इतना विश्वास तो हो ही गया है कि किताब मे लिखी गई हर बात सही नही होती। मैंने कई बार देखा कि लेखक कई दफ़ा बातों को घूमा देता है, फिर कैसे भी अपनी बात सिद्ध करने की कोशिश करता। ऐसे तर्क जिनका कोई अर्थ ही नही बनता। जैसे कि एक लेख जिसका नाम ‘हर कण मे राम हैं’। इस बात को सिद्ध करने के लिए लेखक ने गणित का इस्तेमाल किया। उसने एक समीकरण में कोई भी सख्यां रख कर 2 शेष-फल को दिखाया। चूंकि राम शब्द मे दो शब्द ही हैं इसलिए हर जगह राम पा ये जाते हैं। ऐसी बातें जिनमे बेवजह तर्क लगाकर अपनी बात को मनवाया जाता है, इस बात पर मेरा विश्वास और भी पुख्ता कर देती हैं कि किताब में लिखी हुई हर बात सच नही होती।

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