डर और सीख ।

 

आज मैं आपको एक कहानी बताना चाहती हूँ लेकिन वास्तव में यह एक कहानी नहीं है यह एक सच है एक ऐसी लड़की का सच जो कभी स्कूल नहीं गई,  वह स्कूल जाना चाहती थी पर उसके माता पिता ने कभी उसे स्कूल नहीं भेजा, उन्होंने अपनी बेटी को स्कूल नहीं जाने दिया इसका मतलब यह नहीं था कि वह अपनी बच्ची को पढ़ना नहीं चाहते थे या उसे अच्छी  शिक्षा नहीं देना चाहते थे, वह अपनी बच्ची को अच्छी शिक्षा देना चाहते थे और इसके लिए उस लड़की की माता और पिता जी कई स्कूलों में गए कि कहीं तो किसी अच्छे स्कूल में अपनी बच्ची को पढ़ा सकें उसे अच्छी शिक्षा दिला सकें लेकिन उनको बहुत से स्कूलों में जाने के बाद भी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि वह अपनी बच्ची को किसी स्कूल में डाल सकें । लेकिन उस लड़की को स्कूल जाने की बहुत इच्छा थी पर उस लड़की की माता पिता जितने भी स्कूल मे गए थे उन्होने हर किसी स्कूल मे ऐसा ही देखा था कि हर बच्चे के मन मे अपने अध्यापक के प्रति डर रहता है बच्चे स्कूल मे डर से ही सीख रहे हैं उन्हे सीखने के प्रति कोई आज़ादी नही दी गईं है । बच्चों के मन में अध्यापक के प्रति इतना डर बैठ गया है कि अगर अध्यापक सामने से आ रहे हो तो बच्चे अपना रास्ता बदल लेते थे । तो उनका कहना था कि 

जब तक बच्चे के अंदर डर है बच्चा कभी नहीं सीख सकता

उस लड़की के माता पिता के मन में दो बातें चल रही थी कि अगर वह अपनी बेटी को स्कूल भेजें तो वह डर में आकर कभी कुछ सीख नहीं पाएगी और अगर न भेजें तो अपनी बेटी की ख़ुशी छीन-ने जैसा होगा लेकिन उस लड़की को स्कूल जाने का बहुत मन था वह भी चाहती थी कि वह बच्चों के साथ खेल सकें नए नए दोस्त बना सके । इसके लिए उस लड़की के माता पिता ने अपनी बेटी की ख़ुशी के लिए उसे स्कूल जाने दिया लेकिन उसके माता पिता भी हर दिन उसके साथ जाने लगे और वह स्कूल में बाक़ी बच्चों को भी पढ़ाने लगे लेकिन एक ऐसा तरीक़ा अपना कर जहाँ बच्चे को बिल्कुल डर महसूस न हो और उन्हें पढ़ाई में भी मज़ा आने लगे । 

कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा फिर उस लड़की के माता पिता ने इन सब बच्चों के लिए और पढ़ाई को मज़ेदार बनाने के लिए एक NGO चलाना शुरू किया और उनकी बेटी कुछ ही दिनों तक स्कूल जा पाई लेकिन उन्होंने कभी उसको अपने दोस्तों से मिलने से नही रोका । वह लड़की अपने माता पिता को देखकर किताबें पढ़ती रहती और सवाल पूछती रहती, धीरे धीरे वह अपने माता पिता से बहुत कुछ सीखने लगी बिना किसी डर के ।

और अगर आज देखें तो ये नहीं बोल सकते कि वह लड़की स्कूल नहीं गई है या उसने कुछ सीखा नहीं है वह आज स्कूल जाती है लेकिन पढ़ने नहीं बच्चों को पढ़ाने के लिए और एक बहुत सरल तरीक़ा अपना कर जहाँ बच्चे बिना डरे सीख पाए ।

 उस लड़की ने क्या खोया और क्या पाया लेकिन अगर मैं अपनी नज़रों से देखूँ तो उसने कुछ खोया भी है तो उससे कई ज़्यादा उसने पाया है और उस लड़की का कहना है कि उसने बच्चों की बचकानी हरकतों को खोया । लेकिन यह भी तो बात बिल्कुल सही है ना कि 

 

कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है ।

तो जितना उसने पाया है अगर उसको देखें तो उस लड़की ने कभी कुछ खोया ही नहीं । उसने सब काम करने की या कुछ सीखने की हमेशा आज़ादी पाई ।

डर में आकर बच्चा कुछ भी कर तो लेगा लेकिन उसको वह कभी सीख नहीं पाएगा। इस बात से मैं बिल्कुल सहमत हूँ कि डर में आकर कभी कुछ भी नहीं सीखा जा सकता क्योंकि जब तक हमारे मन में उस बात को सीखने की चाहत नहीं है तब तक हम कुछ नही सिख सकते और जब तक हम किसी भी काम को डर में आकर कर रहे हैं या दूसरे शब्दों में बोलें तो वह हमें करना पड़ रहा है तब तक उस काम को सही से कर ही नही सकते ।

अगर हम स्कूल में किसी अध्यापक के डर से या घर वालों के डर से परीक्षा में अच्छे से अच्छे अंक भी प्राप्त कर लें लेकिन जब तक हमें उस बात सही ज्ञान नहीं होगा तब तक हम उसके बारे में कुछ नहीं कह सकते और अगर डर में आकर हमने कुछ कर भी लिया तो वह भूल भी उतनी ही जल्दी जायेंगे ।

हम किसी काम को सीखने के लिए दूसरों को जितनी आज़ादी देंगे वह उतना ही सही होगा बस फ़र्क इतना होगा कि किसी काम को करने के लिए हमारे अंदर उस काम के प्रति लगन होनी चाहिए ।

क्योंकि :-

अगर तुम्हारे अंदर कुछ करने की इच्छा हो 

तो दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है

उन पढ़े लिखे माता पिता ने अपनी औलाद के लिए एक बहुत जोख़िम उठाया उसे स्कूल न भेज कर । कोई भी माता पिता ऐसे नहीं होंगे जो अपनी सन्तान को स्कूल न जाने दे । परन्तु कहीं न कहीं उनके मन डर रहा होगा कि उनकी बेटी स्कूल नहीं गई तो वह कुछ सीखेगी नहीं पर बस उन्होंने ठान लिया कि अगर उनकी बेटी कुछ सीखेगी तो बिना किसी डर के और उसके लिए उन्होंने अपनी बेटी को घर में पढ़ने के लिए भी कभी मजबूर नहीं किया बस जैसा उसके माता पिता करते उनको देख कर वह भी वैसा ही करती, उसने अपने माता पिता के हाथ में हमेशा किताबें देखी और वह ख़ुद भी किताब पकड़ कर बैठ जाती और बस उनसे सवाल करती रहती । जैसे जैसे वह बड़ी होती गई वह बहुत कुछ जानने लगी और अब वह किसी स्कूल में जाकर बच्चों को पढ़ाती है । उसके माता पिता ने जोख़िम तो लिया पर उन्हें सफलता मिली ।

तो कभी भी 

ज़िंदगी में जोख़िम लेने से घबराओ मत 

अगर जीत गए तो सफलता मिलेगी और 

अगर हार भी गए तो सीख मिलेगी ।

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