पाई साइकिल कैम्प..

“कैम्प” का नाम सुनकर ऐसा लगता है कि सिर्फ़ मौज़ मस्ती और बस यही, बाक़ी और कुछ भी नहीं लेकिन कभी ये नही सुना था कि मौज़ मस्ती के साथ पढ़ाई। हम पढ़ाई का नाम सुनते ही ऐसे डर जाते हैं जैसे पता नहीं क्या बोझ पड़ गया हमारे सिर पर। लेकिन यहाँ पढ़ाई का मतलब सिर्फ पढ़ाई नहीं है या किसी चीज़ को रटना मात्र नही है  इसका मतलब है “सीखना”। कुछ इस तरीक़े से या इस तरह से सीखना और इतनी सरल भाषा में सीखना कि जो सब को समझ आए और हम किसी को भी सरल तरीक़े से समझा पाएँ। उसको अपने हाथों से प्रयोग कर के बता पाएं। 

आविष्कार में जिस तरीक़े से और जितने सरल शब्दों का इस्तेमाल करके हमें सिखाया या बताया जाता है वैसे ही मैं भी कोशिश करती हूँ कि जब भी स्कूल में जाऊँ, जो भी बच्चों को सिखाऊँ वह इतने सरल शब्दों में हो कि हर बच्चे को समझ आए । क्योंकि :-

शब्दों में जितनी ताक़त होगी ,उतनी सरलता उनको समझने में होगी, वरना आवाज़ तो हर कोई ऊँची कर सकता है।

वैसे भी जितने धीमे से बारिश होती है, उतने ख़ूबसूरत फूल खिलते हैं।

तूफान तो सब कुछ बहा कर ले जाता है ।।

कैम्प में आए हुए बच्चे यह सब देख कर कोशिश करते हैं कि जितनी सरल भाषा में उन्हें बताया जा रहा है वह भी सरल से सरल शब्दों में जवाब दें। 

यहाँ आकर हर एक बच्चा सोचता है कि वह अपने दोस्त के साथ रहे कोई भी किसी दूसरे के साथ नहीं रहना चाहता। लेकिन इन सब के साथ हम बच्चों को सिर्फ अपने दोस्तों के साथ ही नहीं रहने दे सकते क्योंकि सब अलग अलग जगह से आते हैं। तो हमारी यह भी सोच होती है कि यहाँ आए सभी बच्चे एक दूसरे के दोस्त बने सब एक दूसरे को समझे ताकि कभी भी ज़िंदगी में उन्हें अपने परिवार से या अपने दोस्तों से दूर अकेला रहना पड़े तो उस परिस्थिति में वह नए दोस्त बना सकें।

बच्चों के साथ रहते रहते मैंने भी बहुत कुछ सीख लिया । सुनने में बहुत बड़ा शब्द है ” ज़िम्मेदारी “

सुन के ही डर सा लगता है जैसे पता नही कितना बड़ा बोझ डाल दिया है किसी ने हमारे सिर पर। किसी के मुँह से सुन ले कि आपको कोई काम करना है और इसको पूरा करने की ज़िम्मेदारी आपकी है तो हम डर जाते हैं। अक्सर हमें अपनी ज़िंदगी में जिम्मेदारियों से बड़ी शिकायतें रहती हैं। मैं किसी भी छोटी छोटी ज़िम्मेदारियों से डर जाती थी लेकिन अगर सोचा जाए तो जब तक हमारी ज़िंदगी में कोई ज़िम्मेदारी ना हो तब तक हम सही रास्ते में जा ही नहीं सकते ठीक उसी तरह जिस तरह एक पतंग को उसकी डोर से अलग कर दिया जाए तो कभी वह अपनी सही दिशा में जा ही नहीं सकती।

अगर हमें किसी चीज़ की ज़िम्मेदारी दी जाती है तो पता नहीं क्यों दिल डर सा जाता है कि हम इसे पूरा कर भी पाएँगे की नहीं । लेकिन जब वह ज़िम्मेदारी हम दिल से निभाते हैं और उसे पूरा करते हैं तो उसे पूरा करने के बाद एक अलग ही सुकून मिलता है । 

अभी कुछ दिन पहले मैं काफ़ी बच्चों के साथ रही एक तरह से बोले तो उनको संभालने की कहीं न कहीं मेरी भी ज़िम्मेदारी थी मैं दिन रात उनके साथ रही। बच्चे थे तो शरारतें तो साथ में होंगी ही हमेशा और छोटे बड़े सभी बच्चे थे तो मन घबरा गया था कि पता नहीं मैं संभाल भी पाऊँगी या नहीं पर इन सब के बीच मे उनसे सीखने को भी बहुत कुछ मिला । देश के अलग अलग कोने से बच्चे आते हैं और उन सब के रहन – सहन के तरीक़े भी एक दूसरे से अलैदा होते हैं । बहुत  छोटे- छोटे बच्चे आते हैं, कुछ तो ऐसे होते हैं जो पहली बार घर से इतनी दूर अपने माँ – बाप को छोड़ कर आए हैं पर फिर भी वह कुछ सीखना चाहते हैं कुछ करना चाहते हैं इसलिए घर से इतनी दूर अपने माँ – बाप से दूर यहाँ आते हैं चाहे कुछ दिन के लिए ही पर उनमें सीखने का ज़ज़्बा है तब भी वह बच्चे होने के बावजूद यहाँ इतनी दूर आने का क़दम उठाते हैं।

किसी के लिए यह बहुत छोटी बात हो सकती है बच्चों को संभालना लेकिन मेरे लिए यह पहली बार था तो मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात थी । धीरे-धीरे मैं बहुत कुछ सीखने लगी हूँ । मेरी ज़िंदगी में कभी ऐसे पल नहीं आए ना मैंने कुछ किया लेकिन अब मौक़ा मिला है तो मैं इसे ऐसे ही गँवाना नहीं चाहती कुछ तो अपनी ज़िंदगी में करना चाहती हूँ। यहाँ आकर इतना तो लक्ष्य बन गया है कि अगर :-

ज़िंदगी में आए हैं तो कुछ करके ही जाना है ।

बबली

हल्ला गुल्ला..

 

एक आर्दश कक्षा कैसी होनी चाहिए?

 

इस साधारण से प्रशन ने मुझको बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया और मुझे क्या पता था कि यह प्रशन  मुझको भी अपने बचपन के विद्यार्थी जीवन के आसाधारण बातों से रुबरु करवा देगा। 

 

अभी तक हम अपनी शिक्षा की कढ़ाई में जितने भी तेल मसाले डालकर उसको बेहतर करने के जितने भी नुस्ख़े देते रहें है उसमें अलग-अलग प्रकार से कक्षाओं के विवरण देते रहे हैं। मगर उसमें यह बात सामने आती रहीं है कि कक्षा को और बेहतर कैसे किया जा सकता हैं जिससे छात्रों के अधिगम स्तर में और वृद्धि लाई जा सके। इसके लिए समय-समय पर भिन्न-भिन्न प्रकार की आदर्श कक्षा की रूपरेखा की संरचना होती रहती हैं जिसमें यह सवाल बार बार दोहराते हुए सामने आता रहता हैं कि “एक आदर्श कक्षा कैसी होनी चाहिए”

जब हम एक आदर्श कक्षा की बात करते हैं जिसमें एक शिक्षक अपने ज्ञान की लौ से बाक़ी के दीयों को प्रज्वलित कर रहा हैं।

मगर शायद हमको अपने इस आदर्श कक्षा के सवाल को और स्पष्ट करने की आवश्यकता हो जाती हैं कि आदर्श कक्षा किसके नज़रिये से छात्रों की या शिक्षकों की। 

यदि शिक्षकों की तरफ से देखें तो आदर्श कक्षा वो होगी जिसमें बच्चे शांति से बैठे रहें और शिक्षक के निर्देशों का पालन बिना किसी हल्ले गुल्ले के करते रहें और यदि छात्रों की दृष्टि से देखें तो इसके पूरे विपरीत जिसमें हल्ले गुल्ले के बिना किसी कार्य का आरंभ और अंत नहीं होगा।

इसको एक उदाहरण से समझते हैं,

एक बार जब मैं अपनी कक्षा की ओर जा रहा था तब किसी दूसरी कक्षा में भाषा पढ़ाती हुई एक शिक्षिका ने बच्चों को बोला अगर तुमने कक्षा में बोला या शोर मचाया तो मैं तुमको और पढ़ाऊंगी। 

मेरे मन में ख्याल आया की यदि भाषा पढ़ाना हैं तो बच्चों को बोलना तो पड़ेगा ही। और फिर हल्ला गुल्ला तो होगा ही।

उसी प्रकार यदि विज्ञान सीखाना हैं तो प्रयोग करवाना तो अनिवार्य हैं और प्रयोग के दौरान छात्रों की जिज्ञासा, प्रयोग के दौरान सभी प्रकार की होनी अनहोनी पर तमाम सवाल और विचार तो सामने आएंगे ही और जहाँ विचार आएंगे वहां मतभेद भी हो सकता हैं। मतभेद जहाँ हैं वहाँ हल्ला-गुल्ला तो स्वाभाविक ही हैं।

एक शिक्षक को अपनी कक्षा के संचालन के दौरान हल्ले-गुल्ले पर पूरा नियंत्रण रखने की आवश्यकता तो है ही क्योंकि यह छात्र की भागीदारी तो सुनिश्चित करता ही हैं उसके साथ छात्रों में उमंग की धारा छोड़ता हैं जिसकी असीम ताक़त कभी भी नियंत्रण से बाहर होने पर कक्षा में अव्यवस्था भी फैला सकती हैं।

इसलिए एक शिक्षक को बारीक़ी से मगर नियमित रूप से अपने कक्षा के हल्ले गुल्ले को नियंत्रण में रखने का प्रयास करते रहना चाहिए।

ऐसा कभी नहीं हो सकता कि किसी हल्ले-गुल्ले के बिना कक्षा का संचालन हो सके। यह तो एक चरण हैं अधिगम का जिसके बिना छात्र की उत्सुकता और उनकी समझ को भांप पाना मुश्किल हैं।

यक़ीन नहीं होगा मगर करना पड़ेगा अपनी फेलोशिप के इस  महीने का अनुभव अपने ब्लॉग के द्वारा करने वाला भी कभी बच्चा था। जो कभी स्कूल भी जाता था और जहाँ तक लगता हैं कि आज के सब बड़े लोग भी कभी बच्चे रहे होंगे। मगर जब बड़े हुए तो फिर हल्ला गुल्ला छोड़ सिर्फ बड़ों की तरह सोचने लगे। 

शुभम कुशवाहा

Sparkling minds of tiny tots!

 

I have recently started exploring – Elementary Math Teaching. Though I am a graduate from IIT Mumbai in CSE, but my heart is always into education. So, I don’t have a corporate job experience, but have taught Science to middle schoolers for more than 5 years. The start-up I founded  and ran for 7 years was also around creating Board Games which allowed learning to happen seamlessly. I continue to work in this field and lately Maths has become by area of interest. So, here I was playing some Math games/activities which the Aavishkaar team introduced to me.  It took me sometime before I realized what was going on with my son(4 yrs) and nephew (5 yrs) during these activities.

 

My son liked counting things but often won’t tag the number and the things properly. The Ganit Mala with 200 beads, gave such a real life problem for counting, something he could touch and the quantity was large and the string made sure double counting was not happening. We used to count in the head earlier by saying the number loudly.

 

It took him a while to figure out the pattern that after 29 comes 30…he kept asking me what comes after 39, 49, 59, and caught up the pattern from 69…he said 70 himself. Earlier, I never got this idea of putting actual 200 things for him to count, so he can figure out the boundaries like 19, 29,…99 etc while actually counting, he can literally see the pattern here. Interestingly after reaching 100…he started counting 0,1,2,3 …and refused to say 101, 102….!

 

Well it took a day for him to accept that there are numbers after 100 🙂

As for my nephew, who has been introduced to multiplication and knows all the tables, was counting 1 2 3 4…when I showed him 4 dots in the 10 frames activity. I added one more dot and asked them how many dots…and he said 5. When I asked how did you arrive at it? He said he counted them. When I asked the younger one..he said 5 …and he explained 2, 2 and you added 1 more, so 5! My nephew also got the hang of finding a pattern..and started using it when I added one more dot. 6, 3+3 came the answer from him.

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10 Frame Activity.

Ganit Mala games with my older one too gave so many opportunities for finding a number….he was forced to break a number into friendly numbers.

 

It was working like a charm.

What I liked about the approach Aavishkaar has towards Maths, it helped me build a REAL view of Maths, Earlier it seemed to be in books only. Here not only was it REAL but I was able to help these 2 boys build this REAL view of Maths in such a short time.

 

A blog by Madhumita.

 

INTRODUCTION TO EXPLORATION.

 

Nov 2, 2019, Time 0600 hrs:  As I boarded the bus from Chandigarh the exploration began. The scenic view on the way to Palampur was very fascinating, butterflies started tickling inside my stomach and I was unable to wait for the clock to strike 1400 hrs, I kept on checking google maps how much distance is left, then finally at 1430 hrs I reached Palampur and the next very movement I called Danish that I have reached.

Danish & Shubham came to pick me up we shared greetings and then we went to pick other co-fellows of Aavishkaar – Babli, Shreya, Aanchal, Divyanshu & Shamli. Starting from Palampur on the way to Aavishkaar campus I kept quiet since the excitement was at its peak to enter the campus which I explored in Google maps. I met the Aavishkaar team Rita, Trilok and few whom I already met on the way to Kandwari. 1600 hrs a small introductory meet was organized for me where we revealed some funny incidents of our life, some more chit chats & end of the day. As the sun started setting down the snow-covered mountains of Dhauladhar range of Himalayas caught my attention, it was glooming reddish in color from the light of the setting sun, this was the first time I was experiencing a clear sky and gazing stars on a cold chilly night and waiting for the sun to rise for next day to continue my exploration.

 

Aavishkaar’s Exploration:

 

Next morning started with the warmth & welcoming attitude of people in a very cold place. Especially Sarit sir and Sandhya ma’am “the techies” but so down to earth that no one can say they lived in the states for a couple of years. “AAVISHKAAR: CENTRE OF SCIENCE, MATHS, ARTS & TECHNOLOGY” as per the name Aavishkaar is the storehouse of ideas and concepts in a mud house named “Library” where we work, the place where ideas emerge and sessions are conducted and every time every individual unlearn and then learn and we (fellows) are here to unlearn- learn – teach some excited and enthusiastic kids. Everything here in Aavishkaar is that which we’ll feel like we know but then later on when we have to teach in a layman language we get stuck and that’s why we first unlearn – learn. 

Sarit sir’s theories and Sandhya ma’am’s Ganit Charchas are always fascinating where we learn everything in a way that if we have to teach our “Dadi” then even she gets a good understanding of the concept. Past one and a half months at Aavishkaar was like a very new roller coaster ride which was full of new learning’s, bonding, observation of class of co-fellows and the scenic view of the place, where every morning fills an individual with positivity and to create a change and I enjoy the sunrise that fills me up with a lot of energy for the whole day and the chilly nights over here. 

On the 7th day of my fellowship, there was a Workshop scheduled “Hamaari Shikshaa” from which I learnt a lot of new things and with different views of every participant and how we can create a change in Education system of India. In the workshop, we learnt a lot about how the Indian Education system is governed who are the stakeholders and how the policies are designed which included a lot of different types of tasks in which we all the Aavishkaar team collaborated and worked with the participants and bonded with them. 

All this while in my few initial days at Aavishkaar I made 2 really good friends my roommates “ShubhamNaam hai Humara’ and “DivyanshuPapa se panga nahi’ with these two and the co-fellows all the other members of Aavishkaar, I never missed my home, I always felt like it is just my Dad and Mom had gone out on a vacation.

And then a couple of weeks after “Hamaari Shikshaa” the moment came when I have to start a new class at Government Primary School – Kandbari and I was very nervous to teach small kids of 3rd, 4th & 5th grade but then Sandhya ma’am and especially co-fellow Babli the expert in teaching young “kids” supported and backed me every time, I just lost control in my first class. I remember an incident where I was teaching number sense and then I just got blanked while teaching reverse counting and suddenly Babli took the charge of the class and helped me to maintain the flow of the class and everyday she helped me in planning for my class. The kids to whom I teach are also very excited and some of them are so fast learners that to keep them excited I have to always think of something new and take that to my class. 

While taking my class, whenever I get a chance of going to DGL nunnery with Sarit sir and Shreya I accompany them and  kids of nunnery are so disciplined and so energetic, the way they think of whatever Shreya teaches them is always fascinating every time I go there I learn something from the kids the patterns they see in Ganit Charcha of dots which we never thought of and the most important thing that I learnt from all the classes that I have observed yet of my co-fellows and myself is that we adults always complicate things and get stuck but on the other hand kids just do everything in a simplified manner. 

Here in Aavishkaar, we have an Engineer not by degree but by knowledge, experienced and talented, whose problem-solving methodology is as simple as kids. He is Roshan Lal Bhaiji the man with high caliber but down to earth. He invited all the members of Aavishkaar to his place for dinner and his family is also same as like him, we all experienced hospitality with simplicity at its best. 

I being an engineer, always enjoy his company, he shares a lot of things to me, I share some experiences with him which I had in my college and I take up a lot of practical doubts to him, he solves them so quickly and I hope an engineer is going to learn a lot at Aavishkaar under the guidance of so many talented, young and energetic people……. Let’s see what I’m going to learn next …………….

 

Sanjay – Aavishkaar Fellow.

एक कुशाग्रबुद्ध शिक्षक की कक्षा।

 

शिक्षक हूँ! अनुभवों से सीखता हूँ, 

चाहे अपने हों या दूसरों के, 

कुछ अच्छा लगता हैं,

तो मैं रख लेता हूँ।

 

एक शिक्षक का जब नाम लेते हैं तो मन में सबसे पहले जो छवि उभर कर आती है वह एक ज्ञानी व्यक्ति  विशेष, तो कभी छड़ी लिए हाथ में किसी व्यक्ति की बन जाती हैं। मगर किसी व्यक्ति विशेष को केवल उसके विषय ज्ञान के भंडार के आधार पर शिक्षक के पैमाने पर आंकना या समझ लेना शायद थोड़ा ग़लत हो सकता हैं।

एक शिक्षक का विषय ज्ञान उसकी सबसे बड़ी करामति ताक़त तो हैं ही मगर उस ताक़त का किस प्रकार से इस्तेमाल किया जाए जिससे वह अपनी कक्षा के संचालन के दौरान छात्रों को उचित ज्ञान तो दे ही सके उसके साथ वह उस कक्षा के परिवेश को भी नियमित व्यवस्थित करता रहे। जिससे अधिगम का एक उच्चतम स्तर बना रहे।

इस उच्चतम स्तर को बनाने के लिए एक शिक्षक का विद्वान होना तो आवश्यक हैं ही उसके साथ-साथ बदलती हुई इस आधुनिक दुनिया में एक शिक्षक का तीव्रबुद्धि या कुशाग्रबुद्ध होना भी उतना ही आवश्यक हो जाता हैं।

कुशाग्र शिक्षक से अभिप्राय एक चतुर शिक्षक से हैं जो कक्षा के परिवेश को भांप कर अपनी शिक्षण रणनीति बदलता तो रहता ही हैं उसके साथ-साथ छात्रों को उपयुक्त दिशा निर्देश द्वारा उनकी भागीदारी भी नियमित रूप से बढ़ा घटा के अधिगम करवाता रहता हैं।

इस माह में अवसर प्राप्त हुआ ऐसे ही कुछ कुशाग्र शिक्षकों की कक्षा में जाने का। जहाँ अलग-अलग शिक्षकों की कक्षा के संचालन की प्रक्रिया तो देखी ही उसके साथ भिन्न-भिन्न प्रकार की तरक़ीबों से भी परिचित होने का अवसर प्राप्त हुआ।

“शिक्षिका जो छात्रों को दिमाग लगाने पर मजबूर कर देती हैं”।

एक शिक्षिका ऐसी भी मिली जो अपने कक्षा में पढ़ाते समय प्रश्नों की झड़ी को इस तरह लगाती थी कि छात्रों की रुचि कभी खो नहीं पाती थी और छात्र पढ़ते हुए ऊब भी न जाए इस बात का भी अनुमान वो भली भांति लगा लिया करती थी। दरअसल वह प्रश्नों को पूछने के सफर को कुछ आसानी से मुश्क़िलात की तरफ इस तरह ले जाया करती थी की छात्रों को इसका बोध भी नहीं हो पाता था और वह अपनी जिज्ञासा को कभी खो नहीं पाते थे। इससे छात्रों की बौद्धिक स्तर का विकास भी नियमित रूप से बना रहता था।

” ग़लतियों को जशन मनाना सीखो”।

ग़लती! किसी भी काम में ग़लती हो सकती है यह एक ऐसा शब्द और एक ऐसी चीज़ है जो आने वाले क़दम को ठहरा देती हैं और चलते हुए कारवां को रोक देती हैं, मगर कक्षा में यदि इस चीज़ का जशन मनाया जाए तो बहुत कुछ सीखा भी देती हैं। शिक्षक को प्रत्येक छात्र को ग़लती करने पर प्रोत्साहित करते रहना चाहिए और एक दिन ख़ुद वह छात्र अपनी ग़लती को सही कर लेने में सक्षम हो जाएगा।

कक्षा में पढ़ाते समय अक्सर देखने को यह बात मिल ही जाती हैं यदि कोई छात्र ग़लती करता है या उससे पूछे गए सवाल का जवाब ग़लत होता है तो ऐसे में उसका पूरी कक्षा में मज़ाक बनता है और वह शर्मिंदगी से शराबोर होकर फिर कभी उत्तर देने की चेष्टा नहीं कर पाता मगर यदि एक कुशाग्र शिक्षक कक्षा में हो तो वह उसके ग़लत जवाब को भी किसी और संदर्भ में सही बताते हुए उसे अगली बार जवाब देने के लिए प्रोतसाहित कर ही देता हैं।

“जो आलस्य भी चालाकी से करता हो”।

एक अच्छा शिक्षक आलस्य भी चालाकी से करता है, वो तरीक़ा अपनाता है की शिक्षण सामग्री को बच्चों के समूह बनाकर सही तरीक़े से बाँट दे। सही समूह से तात्पर्य प्रत्येक छात्र को इस तरह से समूह में पिरोया जाए जिससे वह मिलकर काम कर सकें और उसके इस्तेमाल का सही निर्देशन देकर अपना काम सरल बना ले। फिर बस उसको घूम-घूम कर देखना होगा कि सब समूह सही-सही और मिलकर काम कर रहे हैं या नहीं अर्थात फैसिलिटेट करने तक ही अपना काम सीमित रखे।

क्या एक समझदार शिक्षक वह है जिसके पास सारा ज्ञान का भंडार है? अपनी इस परिभाषा को मैं आज बदलकर एक नई समझ देता हूँ “जो नए-नए हत्कन्डो से शिक्षण को सहज सरल कर दे वह एक समझदर शिक्षक हैं” जिसके लिए वह अपने अहंकार से परे दूसरे की कक्षा को देखे महसूस करे और उसको अपनी कक्षा में अपनाए वह एक समझदार शिक्षक है।

इस महीने ऐसे ही कुशाग्र शिक्षकों की कक्षा को देख बहुत सीखा जो अच्छा लगा, उसको अपने शिक्षण के थैले में रख लिया और इस्तेमाल कर लिया। ऐसे पैंतरे शायद किसी किताब में मिलें न मिलें या कोई बताए या न बताए, मगर सिर्फ अपने साथियों की कक्षा को देख उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला।

इसको करने के लिए कुछ अधिक कठिनाईयों का सामना भी नहीं करना पड़ा बस अपने चश्मे को उतार कर कक्षा को नंगी आंखों से देखने भर का समय लगा। ऐसा कोई भी यदि करे तो फिर वह ऐसे-ऐसे पैंतरे सीख लेगा जो शिक्षण प्रक्रिया को और लचीला बना देने में सहायक हैं।

सभी को कामयाबी अच्छी लगती हैं। हम सब कामयाब होना चाहते हैं और एक शिक्षक की कामयाबी -असल कामयाबी तब बनती हैं जब उसका विद्यार्थी कामयाब होता हैं। एक विद्यार्थी को कामयाब बनाने के लिए इतनी नाकामियों से उसकी परीक्षा लेने के लिए शिक्षक को थोड़ा तो तीव्रबुद्धि बनना पड़ेगा। उसको उसकी ग़लतियों से परिचित भी करवाना पड़ेगा एवं  और ग़लतियाँ वह करे, उससे सीखे इसके लिए भी उसको प्रोत्साहित करते रहना पड़ेगा।

 

शुभम – आविष्कार फेलो।

 

Sketch of Education- My first hand experience.

 

It has been one month and a few days. I have travelled to four states in search of some purpose. I work with Aavishkaar-non profit in Kandwari, Palampur, H.P. Aavishkaar promotes STEM education through a different framework, fundamental and critical understanding for the students who will be citizens of tomorrow. We emphasize students’ understanding so that the student’s finding becomes a developing concept while designing their curriculum. This will help intervene learning, designing and innovating. Rewiring process is developed so that students do not complain about the hardships that they face while studying abstract cogitation such as mathematics and physical sciences.

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Division method by the students which help them understand that division is not just an operation but an activity that can be done with logic and fun. understanding the basics of the subject is important.

 

Aavishkaar also conducts student and teacher’s workshops. Recently, I attended a teacher workshop ‘Hamaari Shikshaa’. Potential educators and learners were invited from across the country to join the enriching session about education. My knowledge of education in development sector was very limited. It had no figures and data to see what was the condition of India in terms of its education landscape. Aavishkaar hosted the program, all the members of Aavishkaar family joined their hands together to start this session.

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The group and discussions.

It was November 9th, 2019- many unknown faces could teach me about education. All I knew about education was that it’s the manifestation of perfection that already exists in any human (rightfully quoting Vivekananda). Still, my aim and purpose in this area was not clear, but I knew I wanted to pave change in my society and to understand its needs in education. As the day proceeded, I visualized education’s law and it’s formulation. It is rightfully ours but we are ignorant of its usage. But I was a little unhappy and thoughts were wandering around- ‘what have I done’. The picture of education became broader when people in this field shared their knowledge and their approaches. Again I was perplexed when my group mates were not ready to accept the reality of society- the caste system which might prove a hindrance to education. In the morning where we spoke about the difference between education and literacy but concepts were in a debate in the evening- where we started behaving as uneducated yet literate people. I was taken aback by the sentiment of nonacceptance. Caste system in education in India is very prevalent. A person from a lower caste doesn’t get an education as teachers or other students do not let them feel safe and secure in that environment. If I wasn’t part of this particular exercise, I would not have known what was the sentiment of educators from urban society about the caste system in education.
10th November started fresh- once again we were introduced to education policies, ASER and some educational tools. ASER results pointed out the structure and finely tuned sketch of education of India. My senses became aware of facts and number, education landscape was never eroded( keeping in mind that we are not talking of quality education) it is just beginning its course. 

 

I became excited and I had a quench for more information. Satiety is not the key to human evolution-knowledge, power and progress become ultimate to our thought process.

 

Reflection and recapitulation of the previous day proved crucial to me when one of the group members shared his thoughts from the previous day,  to quote Aditya Ji ( one of our elderly learners adapted this from Veer Zara- a Bollywood movie)

 

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Sensible Learning is SEE Learning (Social, Emotional and Ethical Learning)

Ethics are moral principles that govern a, person behavior which is good for society, helps in decision making and its virtues are honesty, integrity, empathy, justice, compassion, etc and “SEE” learning is social, emotional and ethical learning designed by Emory University and it provides educators with the tool to foster development of social, emotional and ethical intelligence . I already had the knowledge of ethics but not SEE learning,  so the seed in my mind was watered after an event in Aavishkaar.

It all started with a session of Hamaari Shikshaa workshop,  when we were actor mapping our aim and purposes in life, one of the group talked about SEE learning of which I didn’t have any idea, which she said is inclusion of curriculum, creativity, compassion, etc in education, I was delighted that people are actually talking about this in the world full of darkness and it always  fascinated me but then who knows this can be life changing workshop for any of the participant. In Hamaari Shikshaa, there was a session of Mr. Tenzin Dorjee (Academic Head in Tibetan Education Department) and he shared a new dimension to see this world which we imagine and we want to live in, which we called heaven where everyone wants to go, which used to exist in our ancient civilization and now that place exists somewhere on this earth in a culture (Tibetan Culture). He started by talking about education in exile in which he introduced the Buddhist method of teaching and the Tibetan education system.

After coming to India, Tibetans were under the impression that this settlement is temporary until they get freedom, time passed and they still have not got freedom so they felt the need of education, so with the help of Indian government, their schools got well established and but soon they realized the standard of education is declining their culture and it is getting lost and the need of new education system came to preserve their culture, Tibetan education and restore freedom.

Mr. Dorjee said the aim of education is to awaken and develop human qualities which are wisdom, love, kindness, creativity. Accomplish national goals which are environmental protection, sustainable development, peace, twenty-first-century skills and become self-reliant by empowering humans. He asked  participants what qualities do you want to see in your child after 20 yrs and most of the answers were honesty, kindness, empathy but the irony is that we just  want them to learn Science, Math, History, Geography etc that too without even understanding or exploring the concept and we find trivial to talk about what is love, why to be honest, how to be kind.

I want to relate this to my school times I used to have social science as a subject and I used to learn for scoring better in a subject without even understanding what is it saying, what moral is it giving, what is the actual meaning of the story. That was just mugging up.

One thing which really touched my heart was one of the prime teachings that Tibetan education seeds in their students. “ Who should be put first” and Mr. Dorjee shared according to Buddhist culture one should put partner before themselves, Family before partner then community before Family, Nation before the community,  Humanity before the nation and Sentient beings before humanity. Sentient beings are at the top which is love and kindness for every living thing on earth like insects, animals but in actual reality, we just focus on ourselves, we want to have things at the loss of humanity, nature degradation but never want to sacrifice, never to care much about each other. We are continuously using resources from nature, depreciating it but we never think of returning the favor.

In this life we want to achieve we think of,  achieving success, great future, dreamland  at  the detriment of humanity, environment for better human life what if there won’t be any future, because the pace at which resources are depriving there will be nothing left for coming generations, they will not love each other, there won’t be kindness, no peaceful coexistence of human. Fauna and flora  will disappear then what is the use of success, I have seen people always blame others for the mistake and I can connect to one example, Uttrakhand tragedy where people blamed nature for this catastrophe but actually at first they took toll on nature by developing area, construction is known as development but the irony is it is actually destruction, we want other people to be kind, good but do we really self reflect and find out  “are you the person what you expect from others”?

People after working so hard, running blindly in the race get depressed and then they go to nature, mountains for peace, recovery and meditate as it says nature heals but my quest is what is the sense of race if you are not getting happiness and now I can connect this whole thing to experience. So actually it started long back when I went to DGL Nunnery,  as I entered the campus I suddenly felt the calmness, peace, politeness in the air and when I met girls with red-colored robe and a big smile and such a relief, calmness on their face and their education is different than what we teach in our schools. They learn the principles of Buddhism, their religious text and along with this Science and Math. They curiously understand and explore the concept of Science and Mathematics. I went there with the help of Aavishkaar who teaches Science and Math at such a wonderful place and I am very glad that I got the opportunity to visit. After meeting one can figure out basic ethical values, giving back to the society is inculcated in them are the important part of their education they don’t focus on quantity but on the quality. Qualities we want in our kids already exist there.

Through all this, I realized there is a difference between literacy and education. Literacy is when one can just read or write. It is about acquiring skills and learning,  however, education is when one has a deep understanding of concept, application of her/his skills and learning for the benefit of other people since we have reached the point of literacy, we now need to focus on education.

In Hamaari Shikshaa workshop, I was very happy to see that youth who came from different organizations in India have a vision for noble world, global peace, and standard education system here, they are truly working for this noble cause and through this workshop we got an idea how to implement our views , how to make this work and got the understanding of issues prevailing  and want to make a change , give a hand to someone who don’t have anybody and I believe  the solution to all this is SEE learning and we need to take forward this method where we also teach ethical, social and emotional values along with subject.

 

Aanchal Nikhra (Aavishkaar Fellow)