My first month of Aavishkaar Fellowship!

 

I come from very small town from Madhya Pradesh and I am very ambitious, i want to achieve everything that is for my betterment, i think sky should only be the limitation for my dreams and I want to make a difference in people’s life. So my  determination to never stop, not to settle on less and experience things brought me on a beautiful journey to discover life.

Love for mountains ,Brought me to Aavishkaar…

 

A place where you think, create and love the work you do, not an organization but a world full of Innovation. Here one can feel peace and love in the air .A place in a small village of Palampur where every particle has a story to tell and calmness in every corner and a small family of Aavishkaar who are kind and loving. A place in the lap of Dhauladhar range of Himalayan Belt, where you can feel your inner self healing.

 

On my very first day i saw people sitting in Ojas (a gazebo in Aavishkaar) just like the name one can feel energy, brilliance, positivity in its atmosphere and in the  people sitting there. They were talking and making sketches of each other, introducing themselves as they were from different cities and one can clearly  see unity in diversity in that. It was the first day of Hamaari Kakshaa workshop and in Sandhya’s session we found how mathematics can be games and fun, making it more experiential. By experiencing these new methodologies I found the kid in me, which got lost years ago. People were questioning without hesitation, expressing their fear of subject and concept of fraction ,waves, atom, light, sound etc. Everyone had a story to tell and a lot to discuss.  Playing, thinking and designing together, teaches you the power of group. The energy of participants, their zeal to learn, to question and to not fear while expressing their fears made this workshop amazing.

After the completion of Hamaari Kakshaa new people came for second workshop (Aadhaar Ganit), again same fun with new games, new learning and new people with few more stories and a lot to discuss. Connecting every bit of learning to real life examples. I realized even after studying all  these years, there is a lot to learn about addition, subtraction, division , multiplication and many more ways to look at it. A strong desire to unlearn and learn better again popped up in mind. Aadhaar Ganit workshop ended with a Ganit melaa, many students from nearby schools came and played games along with participants of the workshop. Post completion of the workshop we started with our regular work. Fellows went back to their school work and from here my actual journey started because I am also a Aavishkaar fellow and now new life begins…

 

One day I went to one government school,  this was the first time i realized how good it is to play with kids, to get a smile on their face, be their friends, allowing them to study in their own way and not forcing them. This is the first time i went to any government school and had meal there with students and it was really good. Such appreciation, respect and love  from teachers, Principal, i actually felt connection with kids when they started asking didi ab dobara kab aaoge?

 

Nowadays i am learning how to teach by observing other Aavishkaar fellows classes, how to present topics in class,  how to handle kids, manage them, what to build in them and that is a great task because children are future and right words, right choices  can change the world and that is in  our hand so be careful because small kids are just like a wet clay who need to be mold by soft hand to make hard and beautiful pot. Such a big responsibility in teachers hand who shape the worlds future but sadly not many people wants to be teacher , no one remember them or admire their hard work. Everyone know successful person but no one knows a teacher behind them.

Proud to be a teacher because you are making a difference  every day.

To be teacher takes courage, determination and lot of patience.

And it is the greatest act of optimism and it gives peace.

 

And how can I not express myself on a weekend trip while being here in Himachal, I went out on a small trip to a beautiful station of Paprola and from there a mesmerizing journey to Kangra by toy train train. It was a good trip to begin with in first month.

 

New stories and further journey awaits….

 

Aanchal Nikhra (Aavishkaar Fellow)

 

 

 

 

 

 

 

शिक्षक शिविर: एक बेहतर शिक्षक बनने के लिए।

 

पिछला महीना शिक्षकों के प्रशिक्षण शिविर का हिस्सा बनते हुए बीता। दो शिविर, हमारी कक्षा और आधार गणित आयोजित हुईं। एक 28 सितंबर से 2 अक्टूबर, दूसरी 4 अक्टूबर से 8 अक्टूबर।

इन शिविरों में भी देश के अलग अलग भागों से व्यक्ति आये। तमिलनाडु, दिल्ली, मुम्बई, हरियाणा जैसे राज्यों से अपनी विविधता के साथ आये।

शिक्षा के क्षेत्र मे अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे जुझारू, अनुभवी व्यक्ति इन शिविरों का हिस्सा थे। कुछ मेरे जैसे नौसिखिये थे, कुछ पदच्युत हुए व्यक्ति, तो कई लोग सालों कॉर्पोरेट मे अपना समय बिताने के बाद शिक्षा मे अपना योगदान अच्छे से दे पाने के लिए आविष्कार मे नए हुनर सीखने को आये थे। इन शिविरों की शुरुआत ऐसे महानुभवों के साथ हुई।

ओजस मे बैठे 30 शख्श गुनगुनी धूप का आनंद लेते हुए भिन्न (गणित के अध्याय) को नए अंदाज़ में सीख रहे थे। बीच बीच में ठंडी हवा स्पर्श करते हुए गुज़र जाती, ठंड सूरज की गर्माहट को पल भर के लिए ग़ायब सा कर देती और आने वाली ठंड का एहसास करा रही थी।

 

ऐसे शख्सियतों के साथ गणित के किसी विचार पर चिंतन करने में मज़ा आता।

मेरा पहला दिन काफी घबराहट भरा था। जबकि सिर्फ बैठ कर सुन्ना और बहस का हिस्सा बनना ही था। अगले ही दिन इस पर काम किया और लोगों से घुलना मिलना शुरू किया।

इन कैंपों मे सार्थक बहस का बेजोड़ नमूना देखने को मिलता। शख्श अपने विचार रखते, और असहमति भी जताते। पर हम बातचीत का हिस्सा कम ही होते, सुनते ज़्यादा। 

 

इस पर सरित सर ने एक रोज़ हमलोगों का उत्साहवर्धन किया कि आप लोगों को दूसरों के लिए आदर्श होना चाहिए, आपको चर्चा का ज़्यादा से ज़्यादा हिस्सा होना चाहिए। कभी शिविर में चर्चा हो और उससे जुड़ा कोई भी विचार आ रहा हो तो अपनी बात रखो, ज़्यादा से ज़्यादा ग़लत ही तो हो जायेगा। कोई शख्श अपनी बात रख रहा है और आप उससे सहमत नहीं तो आप ऐसे कह सकते की मुझे ये चीज़ समझ नही आई, मेरे विचार से इसका मतलब ऐसा होता है। क्या आप इसे थोड़ा और समझायेंगे। यह कुछ अच्छे तरीक़ेकार होते है अपना दृष्टिकोण रखने के लिए।

 

कोई सेशन ले रहा है, बीच में आप कुछ पूछना चाहते तो उसका सम्मान करते हुए पूछो, “कि क्या मैं यहां पर एक प्रश्न पूछ सकता हूँ, पर दूसरे को ग़लत ठहराने के उद्देश्य से प्रश्न कभी नही पूछना है।”

 

दो दिन बाद ही ठंड ने अचानक ही अपना रुख़ बदल लिया। ठिठुरती हवा ने सभी को शाल, सदरी ओढ़ने को मजबूर कर दिया। ऐसी ठण्ड के बीच चर्चाएँ करने का अलग ही मज़ा आता। गणित चर्चा ऐसे होती कि ठण्ड का ख्याल ही नही आता।

 

गणित चर्चा के दौरान एक बात पकड़ में आई कि हमारे दिमाग़ में हर एक नंबर का चित्र होता है। ये चित्रण हमारे दिमाग में जितने अच्छे से होगा, उस नंबर को हम उतनी ही शीघ्र समझ पाएंगे। जैसे कि हम पासे के पांच डॉट जहां भी देखते हैं हमे देखते ही पता चल जाता है कि ये 5 है, हम उसे गिनते तक नहीं क्योंकि 5 का चित्र हमारे दिमाग में अच्छी तरह बन चुका है। मैंने कक्षा में देखा था कि नेहा गिनतियाँ तो गिन लेती है पर वो ये नहीं जानती कि किसे एक कहते और किसे दो कहते हैं। उसे छोटे मोतियों से माला बनाने को कहता तो एक मोती को उठाकर डेस्क पर रखती फिर कहती एक। इस तरह गिनती शुरू करती पर 5 तक पहुँचते पहुँचते वो कभी दो मोतियों को एक बोलती तो कभी तीन मोतियों को एक कहती। उसने गिनतियाँ तो याद कर ली थीं पर उसने उन्हें पहचानना नही सीखा था। उसे गिनती की पहचान कराना हमारा काम था। 

चाय और खाने के दौरान शिविर में आये व्यक्तियों से बातचीत होती। कई बहुमूल्य बातें पता चलती जैसे कि बच्चे के ग़लत उत्तर पर उदास मत हो और सही उत्तर मर मुस्कुराओ मत, सामान्य रहो ताकि वो नए तरीक़े से सोचना बंद न करे।

 

अब मैं 23 साल का हो गया हूँ परंतु अब जाकर मैंने सीखा की गणित में भाग किस तरीक़े से किया जाता है। सही तरीक़े से भाग देना सीखा। अब-तक जैसे सीखा था वो गलत था, अब मेरा दायित्व है कि दूसरों को सही सिखाया जाए।

 

विज्ञान के भी कई सत्र हुए। उन्हीं में से एक विद्दयुत का था। ये अध्याय मुझे ठीक से नही आया। इसे फिर से समझना है। कैंप के दौरान चर्चा इतनी गहन हो जाती कि चाय का समय भी इसी मे समाप्त होने को होता। समय सीमा समाप्त होने के बाद भी कोई बिग-बैंग पर चर्चा करता दिख जाता तो कोई अणुओं पर।

 

कैंप मे बदलते सत्रों के जैसे मौसम भी बदलता रहता, एक रोज़ चारों ओर से बादलों ने घेर लिया, बादल सर्दियों के कोहरे की नमी महसूस कराते हुए हमारे चेहरों से टकराते हुए आगे की ओर बढ़ते जा रहे थे, कुछ पल को हमारा ध्यान भटकाते जा रहे थे। कुछ देर बाद ही हमारे बीच (ओजस में) और आसपास बादलों का हजूम सा लग गया। ज़ोरों की बारिश होने लगी। इस बीच एक प्रश्न उठा कि बादल तो ओजस के अंदर भी है तो यहां क्यों नहीं बारिश हो रही है? इस तरीक़े से हमारे बीच मंथन होता रहता।

 

क्रिटिकल थिंकिंग पर चर्चा हुई। सभी ने अपने विचार रखे की क्रिटिकल थिंकिंग क्या है? किस तरीक़े से हम अपनी क्लास के बच्चों में इस चीज़ का विकास करें।

कक्षा में कैसे प्रश्न पूछने चाहिये की बच्चे गहन सोचना सीखे? 

जो लोग आये वो कितने लाजवाब थे। मैं अपने जीवन में पहली बार इतने सहज और विनम्र लोगों से मिला, और उनसे बातचीत हुई। उन्हीं मे से एक शख्श था श्याम, जो तमिलनाडु से था, उनकी समझदारी भरी बातें मुझे छू गई। उन्होंने सिखाया कि खुलकर रहो, अपनी बातें छुपाओ नहीं। किसी को पता चल जायेगा तो क्या हो जाएगा। जितना लोगों से अपनी बातें साझा करोगे, उतना ही वो तुमसे करेंगे। और उतना ही विश्वास बढेगा। हो सकता है तुम कुछ बातें न बताना चाहो पर फिर भी बात करो। उसने अपनी रहस्यमयी बातें मुझे बताई जो मै कभी किसी को नही बताना चाहूँगा, इसके बाद बातों का आदान प्रदान शुरू हुआ। मैंने अपनी समस्याएं पूछीं, उन्होंने अपनी तरफ से उस पर सुझाव दिए।

 

उन्होंने समझाया कि किस तरीक़े से तुम अपनी फ़ेलोशिप को बेहतर बना सकते हो, क्योंकि ये सिर्फ तुम्हारे विकास के लिए ही है।

 

इन सभी लोगों का तहे दिल से शुक्रिया जो इस शिविर का हिस्सा बनने को आविष्कार आये, स्वयं सीखने और सिखाने।

दिव्यांशु (आविष्कार फैलो)

 

मेहनत 

 

 ज़िंदगी में कोई भी काम ऐसा नहीं है जिसको करने में हमें मेहनत ना करनी पड़े या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो बिना मेहनत के कोई भी कार्य संभव नहीं  है।  

 

हमें ज़िंदग़ी में जो भी कड़ी मेहनत करके मिलता है उसका आनंद ही कुछ अलग होता है और  उस आनंद को आज मैंने महसूस किया । ऐसा नहीं है कि इससे पहले या आजतक मैंने कोई मेहनत नहीं कि बस फ़र्क़ इतना था कि शायद पता ही नही था, कि वास्तव में  मेहनत शब्द का अर्थ क्या है । लेकिन अगर आज मैं इस शब्द का अर्थ बताऊँ तो मेरे लिए इसका अर्थ है “सुकून” । मेहनत करके मिली सफलता में जो सुकून है वह कहीं और नहीं । बेशक सफलता अगर देर से मिले लेकिन अगर मेहनत करते रहो  तो सफलता एक न एक दिन ज़रूर मिलेगी और यह बात हमेशा याद रखना कि :-

 

दूसरों की अपेक्षा आपको अगर सफलता देर से मिले तो निराश मत होना क्योंकि मकान बनने से ज़्यादा समय महल बनने में लगता है ।।

 

 जब भी मैं आविष्कार से किसी की भी कक्षा को देखने गई कि किस तरह से पढ़ाया जाता है तो उनकी भाषा इतनी सहज और सरल होती है और जो भी बोलते हैं बच्चे उसे जल्दी से पकड़ लेते थे तो यह देख कर मेरा बस सपना रह जाता था कि शायद मैं इस तरह से कभी भी अपनी कक्षा में नहीं लेकर जा सकती । पर इस पर मैंने बहुत मेहनत की मैं बस अपने आप में ही बोलती रहती थी कि मैं कक्षा में कैसे बोलूँ कि बच्चे मेरी बात को समझें।

 

इस सब के चलते आज की कक्षा के बाद मैंने सोचा शायद मुझ में कुछ बदलाव हुआ है और यह शायद की गई मेहनत का फल है जब बच्चे बिना कोई तरीका बताए कक्षा में बहुत अच्छे से करने लगे न तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और आज मुझे कितनी ख़ुशी मिली है मैं वह बयां नही कर सकती बस मैं इतना बोल सकती हूँ कि आज मेरे चेहरे से मुस्कुराहट नहीं हट रही थी और अब मेरे द्वारा कही गई बात को बच्चे जल्दी से पकड़ लेते हैं और उसे अच्छे से करते हैं । आज मैंने एक बात सीखी है कि :-

 

अपनी ज़िंदगी में कोई भी काम करो इतनी शिददत और मेहनत से करो कि अंत में बेशक आपको उतना न मिले जितना आपने सोचा हो पर अपनी मेहनत से जितना भी आपने दिया है वह आपको इतनी सुकून देगा कि कुछ और पाने का मन नहीं करेगा । 

 

 मेरी कक्षा में एक ही लड़का है बाकी सब लड़कियाँ और पहले जब मैं  कक्षा में जाती थी तो स्कूल से आने के बाद जब भी रिफ्लेक्शन शीट को भरती थी तो उसमें लिखा जाता था कि कक्षा में एक लड़का है विशाल जिसकी  प्रतिक्रिया कुछ ज़्यादा अच्छी नहीं रहती होती है क्योंकि वह सवाल नहीं करता था तो उसके लिए मैंने उसे कई बार अकेले समझाने की कोशिश की फिर उसके बाद उसमें थोड़ा थोड़ा बदलाव आने लगा और अब देखा जाए तो कक्षा में सबसे ज़्यादा सवाल वह करता है और अब मेरी रिफ्लेक्शन शीट पर लिखा रहता है कि विशाल की प्रतिक्रिया कक्षा में सबसे अच्छी है और यही मेरी ख़ुशी का सबसे बड़ा कारण है अपनी कक्षा में बदलाव लाने के लिए मैंने बहुत मेहनत की है और उस मेहनत का फल मुझे आज अपनी कक्षा में दिखा है और यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है ।

 

 कभी भी हम अपने सूखे हाथ की मुट्ठी में रेत को पकड़ कर नहीं रख सकते लेकिन अगर हाथ पसीने से भरे हों तो हम रेत को भी अपनी मुट्ठी में आसानी से बंद करके रख सकते हैं।

 

उस पसीने का असली कारण है मेहनत। कोई भी काम सिर्फ सोचने से नहीं होता है उस काम को पूरा करने में  कड़ी मेहनत की ज़रूरत होती है और जिस भी काम को करने में जितनी ज़्यादा मेहनत लगे उसकी सफलता उतनी ही मज़ेदार होती है । काम चाहे छोटा हो या बड़ा बिना मेहनत के कोई भी कम पूरा नहीं हो सकता ।

 

यह मेरे लिए बहुत बड़ी सफलता है लेकिन इस सफलता के पीछे सिर्फ मेरा हाथ नहीं है आविष्कार के बाक़ी लोगों का भी हाथ है वहाँ  हर दिन किसी न किसी इन्सान की मदद से अगली कक्षा की तैयारी की जाती है, कक्षा अच्छी हो इसके लिए आविष्कार के लोग कड़ी से कड़ी मेहनत करते हैं और  बच्चों को अच्छे से समझ आए इसलिये उनको कुछ न कुछ चीजें ले जाते हैं ताकि हर एक बच्चा अपने हाथ से कर पाए और उसे अच्छे से समझ सके। कक्षा में हम जितनी मेहनत करके जाते हैं आगे से उतना ही अच्छा परिणाम मिलता है हमारे द्वारा की गई मेहनत का अच्छा फल मिलता है और मेरे लिए यही मेरी सफलता है ।

 

महेनत एक घण्टे का काम नहीं 

मेहनत ज़िंदग़ी भर का काम है ,

मेहनत सिर्फ समय का नाम नहीं 

मेहनत सफलता का नाम है ,,

 

और अंत में मैं यही कहना चाहूँगी कि मेहनत करना कभी ना छोड़े सफलता एक न एक दिन ख़ुद आपके क़दम चूमेगी। क्योंकि :-

 

सफलता चाहे छोटी हो या बड़ी 

उसके रास्ते हमेशा कदमों के नीचे होते हैं।

 

बबली (आविष्कार फैलो)

Expressing Mathematically.

 

These days writing has become a bit difficult for me. It’s not that I don’t write, but I am generally writing about teaching math, and that too mainly about introducing concepts and trying to break them down for teachers, so that students are able to conceptually get it.
One day I could be thinking about algebraic expression, while another day about division. And yet another day about add or subtract, and yet another day about basic number sense. How do we get a sense of numbers? It still baffles me how little kids are able to decode numbers, such an abstract concept. Numbers are something we cannot touch, feel, taste or see, but we still get it that we are talking about one. Kids are able to figure this out even before coming to school. Researchers have done studies on other animals, and have found that they possess some basic number sense. Apparently crows can decipher upto number 3. Isn’t that amazing? Little kids play with dice, and can decipher numbers up to 6. Thanks to the expertise of pattern recognition that we have. They may not conceptually understand a 4, 5 or 6, but perceptual understanding is there. When they come to school we work on this conceptual understanding. They learn the language of math.
Learning the language of math is not only understanding it’s grammar and syntax. It’s much more than that. Through the  digits 0 to 9 and the little decimal, we can create any number in the world that is possible. No combination of numbers is a gibberish. Every number, yes every number makes sense, and represents something unlike any other language in the world. Throw in some operations with the digits, and then see their power. They start making each other. Each number can be instrumental in making another. The digit signifying nothing, zero, sometimes it has power to kill when it’s armed by multiplication operator, while with add, it bites the dust, can’t to a thing to others. At yet another time, when armed with division, the smartest of mind can’t figure out what it does to the other number.
And look at its neighbor 1, it’s powerless with the armor of multiplication or division. It can’t change the number in any way. But still it tends to be a keeper of neighborhood relationships. Armed with the operators of add or subtract, it will immediately take the number to its neighbors. We need such properties in humans also, all over the world.
Come to think of it, zero also tend to be friendly many times. It never mind it’s place been take by another digit for a short cut representation. For example, 100 and 30 and 5 can be written in short cut form as 135. Have you ever seen zero raise a hue and cry about it. It sacrifices being written at three locations, but it never complains. It’s another matter that we totally forgot that we have snatched it’s place, and that creates a lot of problem for our kids, because our students don’t know that we took away it’s place for a short cut.
Zero is friendly many other ways. Let’s think of another number 1035. No digit has taken hundreds place yet. Zero doesn’t mind. It says, you could put me there as a place holder, so that everyone known that 1 is a thousand, and not a hundred. Imaging if zero was not cooperative, how would we have distinguished between a 1035 and 135?
Have you ever thought about the size of smallest particle, or the size of a microbe, an ant, earthworm, dog, zebra, elephant, dinosaurs, earth, sun, solar system, milky way or the universe? Guess what, these digits from zero to 9 can combine together to tell you that, and that too in one straight line and not scattered all over the place. And they are only ten of them. Let’s count the decimal in, the four main operators, the fraction bar, the percentage and the equal to sign. It still makes only 18 symbols. These are the ones that we tend to use in our daily life. Only 18, and they take care of all our financial expressions: How many people are coming for dinner, how much to cook today, how much water, how much milk and sugar in tea, how much money to take out to from the bank. Did she get the fair wages, did I make a profit or a loss. What fraction of the wealth is mine when we divide, how many litres of petrol is needed to hit that far. It’s an endless list. But look at the power of these 18 symbols. Add a few more to them, and the mathematicians write equations for nature. When alphabets start collaborating with digits and operators magic happens… We almost start to feel that we are getting close to the key to understanding nature. It might be a very long path, but these ten digit in collaboration with some others seem to hold this power of expression within them.

मेरी कक्षा, बच्चे और विकास की ओर एक और क़दम।

अपनी कक्षा के बच्चों, विद्यालय, उनके व्यवहार के बारे मे कुछ बातें साझा करना चाहता हूँ। जैसा की पिछले अंक में बताया था कि बच्चे बात सुनते तक नहीं थे, पर अब उनमें बदलाव दिखता है। अब बिहैवियर मैनेजमेंट का असर बच्चों पर दिख रहा है। अब बच्चों को पता है, भैया किस तरीक़े से काम करते हैं, किस बात पर ग़ुस्सा हो जाते है, उन्हें पता है। वह बच्चे बार बार कहने पर भी सुनते नहीं थे, अब कक्षा में मात्र प्रवेश करते ही शांत बैठ जाते हैं। देखकर ख़ुशी होती है। शोर होने पर मेरे बस चुपचाप खड़े हो जाने पर कहने लगते कि हमे पता है कि भैया नाराज़ है, चुप रहो।

यह जानने के लिए कि आज भैया क्या कराएंगे, आवाज आती कि भैया आज क्या लाए हैं, भैया वो वाले डिब्बे लाए हैं ना?

 

उन्हें शुरुआती 5-7 मिनट खेलने में बड़ा अच्छा लगता है। परन्तु मुझे आश्चर्य होता है कि अब वह मुझसे एक बार भी नहीं कहते कि भैया खिलाओ, बस देखते कि भैया क्या कराएँगे? जब कभी खेल नहीं कराता तो वह जिद नहीं करते कि खेल खिलाओ, वह नहीं दूर भागते पढ़ाई से क्योंकि उन्हें पता है कि आगे जो कुछ भी भैया करेंगे उसको करने में भी मजा हि आएगा।

कक्षा में प्रवेश करने के बाद जब कहता कि बीच में आ जाओ, तो वो सब खुशी से दौड़कर आकर एक दूसरे से कंधे से कंधा मिलाकर छोटा सा गोला बना लेते, पूछते कि भैया आज कौन सा खेल खिलाएंगे?

कक्षा में विविधता है, कोई बहुत बोलता है, कोई बहुत कम बोलता है, कोई चुपचाप होकर अपना काम करता है तो कोई शोर, कोई लड़ाई करता है तो कोई अपने में खोया रहता है। तो कभी सब मिलकर मुझपर हँस लेते।

कभी आपस में झगड़ा करते तो कभी जूते का फीता खुल जाने पर एक दूसरे के फीते बाँध भी देते।

जैसे कि उन्हें जोड़ना सिखाते वक्त मैं बच्चों से पूछता कि कौन बताएगा 15 नंबर को दो नंबर की सहायता से कैसे बनाया जा सकता है?

आवाज़े आतीं कि भैया मैं, भैया मैं…। तो कोई चुपचाप हाथ खड़े करे रहता और कोई चुपचाप बैठा रहता।

पंकज जो अत्यधिक चुलबुला है। कहता, “मुझे तो आता है, भैया मुझसे पूछो।”

“पंकज ने हमारे बनाए नियमों का पालन किया”, मैंने पूछा।

“नहीं। भैया बोलने से पहले हाथ ऊपर नहीं किया”, कनिका ने हाथ ऊपर रखते हुए बोला।

पंकज आप आओ बोर्ड पर लिखो आकर।

5 जमा, 5 जमा, 5.

शिवम् ,”10 जमा 5″। “सात जमा 7”, शान्या।

किसी को दूसरे तरीक़े से लिखना है या फिर कुछ सुधार करना है तो बताओ।

शिवाली, “6 जमा 6 जमा 3″।

“ऐसे नहीं होता है मुझे पता है, भैया आप मुझसे पूछते ही नहीं हो”, पंकज।

“7 जमा 7 जमा 1 होगा”, पंकज।

“भैया मुझे यह नहीं करना है, मुझे धागे वाला दो, या कुछ और दो”, नेहा कहती।

नेहा अधिकतर यही कहती, जब कभी मैं नेहा के लिए अलग से सामान नही ले जाता तो मुझे उसे यही दिलासा देना पड़ता कि बेटा बाक़ी लोग भी यही कर रहें हैं, आप भी कोशिश करो।

ऐसे ही किसी रोज़ एक एक्टिविटी करवा रहा था तो उसमें बच्चों को गिनती गिननी थी नेहा ने फिर यही कहा कि मुझे भैया यह नहीं करना है तो मैंने कहा कोशिश करो। आपको 20 तक गिनती आती है इसलिए आप यह कर लोगे। इस पर उसके बगल वाली बच्ची बोली कि भैया इसको गिनती नहीं आती है इसको मत करवाओ कुछ और दे दो। इस बच्ची की बात में इतना विश्वास था कि जैसे कई दफ़ा ये बात नेहा को बोली जा चुकी है।

इस पर नेहा बोली, “हां भैया, मुझे नहीं आती है”।

ऐसे ही इतने ही बच्चे उपेक्षित कर दिए जाते हैं। मजबूर किए जाते हैं मानसिक रूप से कमज़ोर होने और खुद को कमज़ोर समझने के लिए।

 

उम्र में मेरे स्कूल की अध्यापिका बच्चों के समान है, उनका व्यवहार भी हमारे प्रति अच्छा है।

पर एक ऱोज उनका व्यवहार ठीक नहीं लगा। जब वो नेहा के सामने ही कहने लगीं, “यह कमजोर है, पता नहीं क्या बात है तीन बार कक्षा दोहरा चुकी है। अभी तक यह 20 तक गिनती ही नहीं पहचान पाती”। नेहा की दीदी जो सामने ही बैठी थी, से पूछा गया कि इसको पढ़ाती हो कि नहीं। कहने लगीं कि इसके घर वालों से इतनी बार कहा कि इसे किसी स्पेशल स्कूल में भेजो, पर मां-बाप उसे ख़ुद से दूर ही नहीं करना चाहते हैं।

कक्षा के दौरान मैंने देखा कि वह बच्ची उत्तर जल्दबाजी में देती, कुछ भी बोल देती। जैसे कि जल्दी से छुटकारा पाना चाहती है।

“3 जमा 2 कितने होते हैं”, पूछता।

वो बोलती, “7”।

नहीं, सोच कर बताओ। “भैया 6, नहीं 8…..”, कहती।

इस तरह नंबर पर नंबर बोलती चली जाती और मेरे चेहरे की ओर देखती कि भैया कब पूछना बंद करेंगे?

पर जब ज़ोर देकर कहता कि ऐसे नहीं सोच कर बताओ। फिर पूछता कि आपको हमने तीन टोपियाँ दी फिर दो और दी तो आपके पास अब कुल कितनी टोपियाँ हो गई। तब बता देती कि पाँच।

नेहा एक दिन अपनी कॉपी मे 1 से 100 तक लिखी गिनतियों को दिखाते हुए बोली कि ये मेरी माँ ने लिखाई है। कक्षा की अध्यापक भी समय समय पर छुटपुट गिनतियों का अभ्यास उसे उसकी कॉपी मे करवाती रहती हैं।

5 सितंबर को विद्यालय में छोटा सा कार्यक्रम था, बच्चों ने तरह तरह की प्रस्तुतियां दी। उस दिन नेहा बहुत खुश थी, झूम रही थी गानों पर। उस खुशी मे वो दुसरे छोटे बच्चों को दुलारती। हो सकता है वो किसी अन्य काम को बेहतर तरीक़े से कर सकती हो, डाँस, खेल,……….

हमें अध्यापक, बच्चों के साथ अच्छे संबंधों के साथ-साथ बच्चों के अभिभावकों से भी मिलना होता है। जिससे कि बच्चे के विकास में और भी योगदान दे सकें।

इस तरह मैं अपनी इस फ़ेलोशिप के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुँचा हूँ कि बच्चों के घर जाया जाए, अब बस नेहा के अभिभावकों से मिलने की देरी है।

उम्मीद करता हूँ मैं नेहा को इस मुश्किल दौर से बाहर निकाल पाउँगा..

चाय पर फिर से आना।

 

प्रतिदिन विद्यालय में पाठन-अध्यापन की दिनचर्या ने विद्यालय और हमारे बीच जो रिश्ते की डोर को एक धागे में पिरोया हैं उसने अपने स्नेह की छत से हमको कभी ऐसा महसूस नहीं होने दिया कि विद्यालय हमारा दूसरा घर नहीं हैं। अब जैसे विद्यालय अपना ही घर हो चला हैं और यहां के सभी छात्र एवं शिक्षक गण मिल कर उस घर का, विद्यालय परिवार का एक हिस्सा बन चुके हैं।

 

इस घर में समय बीतता गया और हम बच्चों को नई-नई चीज़ें करवाते गए और खुद भी नई-नई चीज़ सीखते गए। इस सीखने-सिखाने की जगह अपने विद्यालय के बारे में अभी तक तो मैं इतना ही जानता था कि यह मेरा स्पैडू गांव में स्थित विद्यालय जो पालमपुर की एक पहाड़ी पर हैं केवल प्राथमिक शिक्षा तक ही उपलब्ध हैं, यहाँ शिक्षा लेने के बाद सभी बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए दूसरे गांव में जाना पड़ता हैं। जो कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। मुझे सुनकर थोड़ा अचरज हुआ कि शिक्षा के अमृत को चखने के लिए बच्चों को कितना चलना पड़ता होगा । उनका हर कदम संघर्ष की एक नई इमारत को बुनता होगा।

मगर जानने को मिला कि अभी भी उनको अपनी प्राथमिक शिक्षा के लिए काफी चलना पड़ता हैं।  थोड़ी सी जानने की जिज्ञासा उतपन्न हुई कि बच्चे कहाँ-कहाँ और किस गाँव से आते होंगे। हमारी इस जिज्ञासा ने जब पर खोले तो मन में और भी बातें आनी शुरू हो गयी कि यहाँ के लोग कैसे और किस प्रकार से रहते होंगे। इन असीम संभावनाओं का जवाब हमको तलाशने का एक ज़रिया मिला, सामुदायिक दौरा। सोचने में ज़्यादा समय नहीं लगा कि अगर हमको समाज को समझना हो तो हमको कहाँ और किसके घर जाना चाहिए, हम हमारे छात्रों के घर जा सकते हैं। यह कितना अच्छा भी है किसी अनजान समाज-समुदाय में जल्द ही जगह बनानी हो या उसमें परिवर्तन की लहर लानी हो या फिर प्रगति की रफ्तार बढ़ानी हो, उसको भली-भांति परिचय जानने और करने के लिए कितना सहज और सरल तरीक़ा हैं।

चुनाव किया की सारिका के घर जाएंगे जो पांचवीं कक्षा की छात्रा हैं क्योंकि उसकी दो बहनें और भी हैं जो किसी और कक्षा में उसी स्कूल में पढ़ती हैं। तो एक दोपहर विद्यालय की घंटी बजती हैं सारिका से पूछते हैं आज क्या हम तुम्हारे घर चल सकते हैं क्या? वह बहुत ही उरालता से कहती हैं, “हाँ हाँ-चलो चलो”। हैरान थे हम, बच्चे ने चलने में इतनी उत्सुकता दिखाई। सोचकर बैठे थे कि वह मायूस होगी या घबरा कर बोलेगी, “मैंने ऐसा विद्यालय में क्या कर दिया कि शिक्षक मेरे घर आना चाहते हैं”। पर ऐसा नहीं हुआ और हमने फिर पूछा कि तुम कहाँ से आती हो, जवाब आया रछियाडा से । हमने कहा चलो। फिर उसके घर की ओर चल दिये। लगभग 15 से 20 मिनट पहाड़ की उबड़-खाबड़ पथरीली जमीन पर चलने के बाद उसका घर आया। वह घर तीन भाइयों का था जिनमें से दो भाई चरवाहे थे वह अपना पारम्परिक काम करते थे, भेड़-बकरियों को चलाते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना। जिनको मैं सातवीं-आठवीं कक्षा में भूगोल की किताबों में पढ़ा करता था, विचार उस समय भी वही था जो आज आया, कैसे यह लोग घर से दूर साल भर तक इधर से उधर एक शहर की पहाड़ी से दूसरे शहर की पहाड़ी का रास्ता तय करते हैं। वह केवल एक माह के लिए ही घर आते हैं बाक़ी महीने अपने भेड़-बकरियों को पहाड़ियों पर घास चराते हुए शहर गांव दर अपनी भेड़ों को बेचते रहते हैं और उनके ऊन को भी बेचते हैं। जब वह घर आते हैं तब उनके ऊंन को निकाल कर उनसे तरह-तरह की कपड़े और कंबल बनाए जाते हैं। उन्होंने हमको उनसे बने हुए काफी सारे कपड़े दिखाए।

उस आधे घंटे की गप-शप और चाय की चुस्की में छुपी सारी कहानियां बाहर आती गई। कहानी-कहानी में हमको उनके गांव, रहन-सहन जानने को मिला। और उनके घर से जाते जाते उन्होंने अपने चेहरे पर एक मुस्कान लिए कहा चाय पर फिर से ज़रूर आना।

 

इस पूरे एहसास को मैं यदि बयान करना चाहूं तो कुछ इस तरह से कर सकता हूँ

 

घर से निकलकर देखो,

एक जहान ऐसा भी हैं

अपने पड़ोस में जाकर तो देखो,

चाय की चुस्की का मज़ा कुछ और भी हैं।

अनेकता में एकता

‘ एकता ‘ जिस शब्द का अर्थ है ‘ एक साथ मिलजुल कर ‘ जब अनेकता मिलकर एकता बनती है तो उस एकता को कोई नही हरा सकता । मैंने बचपन में एक कहानी पड़ी थी कि एक जंगल में चार गाय रहती थी जो कि बहुत अच्छी दोस्त थी पर उसी जंगल में एक शेर भी रहता था । वह शेर हर दिन उन चारों गाय को देखता रहता और वह उनको अपना शिकार बनाना चाहता पर वह डरता था  क्योंकि शेर एक ही था और गाय चार जो कि आपस में मिलजुल कर रहती थी और उन चारों में गहरा रिश्ता था । शेर को पता था कि अगर उसने उन पर हमला किया तो वह मिलकर उसे मार देंगी । शेर हर दिन सोचता रहता कि इनको शिकार कैसे बनाया जाए । फिर एकदिन उन चारों गाय की आपस में लड़ाई हो गई और सब एक दूसरे से अलग हो गई यह देखकर शेर बहुत ख़ुश हुआ और उसने चुप-के से एक गाय को अपना शिकार बना लिया और उसे खा गया । धीरे धीरे उसने सब गाय को अपना शिकार बनाया और उन्हें खा गया । पहले जब उन चारों गाय ने एकता बनाए रखी थी तो तब तक उनको कोई हाथ नहीं लगा सकता था लेकिन जैसे ही उनकी एकता टूटी उन सब ने अपनी जान को गँवा दिया ।

तो ये कहानी जब हमें अपने बचपन में  सुनाई जाती थी तो हमसे पूछा जाता था कि इस कहानी से आपको क्या सीखने को मिलता है तो हम कह देते थे कि ‘ एकता में ही बल है ‘ पर वास्तव में मुझे इसका सही मतलब नहीं पता था ।

हम बहुत से ऐसे काम करते हैं जो सिर्फ अकेले बैठ कर नहीं किए जा सकते उसमें किसी का साथ होना ज़रूरी होता है और एकजुट होकर जब हम किसी भी काम को करते हैं तो उसका महत्व ही अलग होता है जितना अकेले का नहीं होता ।

और बोलते भी हैं ना कि :- 

 

हाथ की पाँच ऊँगली में उतनी ताक़त नहीं होती है।

लेकिन जब वही पाँच उंगलियाँ एक मुट्ठी बन जाती है तब उसकी ताक़त को कोई नहीं हरा सकता ।।

 

जब से मैं आविष्कार में आई हूँ तब से सबसे ज़्यादा मैंने यही देखा है कि सब यहाँ मिलजुल कर काम करते हैं कभी भी मैंने किसी से ये नहीं सुना कि कोई किसी की मदद नहीं करेगा ।

तो असल में एकता है क्या,  इस बात का सही मतलब मुझे आविष्कार में आ-के पता चला वास्तव में  एकता है क्या इस शब्द का सही अर्थ मुझे यहाँ आकर पता चला ।

आविष्कार में सबसे ज़्यादा एकता पर बल दिया जाता है क्योंकि  मैं यहाँ फैलोशिप के लिए आई हूँ। फैलोशिप का मतलब ही यही है कि एकजुट होकर काम करना मिलजुल कर रहना और जब से मैं आविष्कार में आई हूँ तब से मैंने यही सुना है और देखा कि यहाँ लोग एक-दूसरे की मदद लेने में हिचकिचाते नहीं हैं और यहाँ कि सबसे अच्छी बात है कि कभी भी यहाँ पर आप किसी से भी मदद मांगे तो वह कभी भी मना नहीं करेंगे, अगर वह दूसरे किसी काम में भी लगे हो तो भी वह मना नहीं करेंगे बाद में वह ज़रूर मदद करते हैं । अगर कुछ पता न लगे तो हम कितनी भी बार पूछ सकते हैं क्योंकि आगे से मदद के लिए कभी मना नहीं होगा । आविष्कार में उन लोगों को माना जाता है जो कि ज़्यादा से ज़्यादा सवाल करें और यहाँ पर माना जाता है कि जिन लोगों के पास किसी भी बात को लेकर कोई सवाल नहीं होता उसमें दो ही बातें हो सकती है  या तो उन को सब कुछ आता है या कुछ भी नहीं । बस कुछ ना कुछ सीखते रहो और सवाल पूछते रहो चाहे वह कैसी भी बात हो, उसे छोटा या बड़ा नहीं समझना है क्योंकि कुछ भी छोटा या बड़ा नहीं होता बस एकता को अपनाना है और एकजुट होकर काम करना और यहाँ की इसी एकता के कारण आविष्कार के लोगों को आविष्कारकस कहा जाता है । यहाँ की सबसे अच्छी बात ये भी है कि कभी यहाँ किसी पर कुछ भी काम थोंपा नहीं जाता बस हम में उस काम को करने की चाहत होनी चाहिए तो फिर सब मन से आपकी मदद करेंगे ।

कोई भी काम तब तक सही नहीं होगा जब तक हम में उसको करने की चाहत नहीं होगी । बस उस काम में आपकी आवश्यकता दिखनी चाहिए और आप सब ने ये बात तो सुनी ही होगी कि 

आवश्यकता आविष्कार की जननी है ।

कभी कभी हम इतने अकेले पड़ जाते हैं कि किसी से मदद माँगना या किसी से भी बात करना अच्छा नहीं लगता।

इन्सान पर जब मुसीबतों का पहाड़ टूटता है तो ज़िंदगी मानो जैसे नर्क बन जाती है लेकिन उन मुसीबतों को दूर करने का ज़ज़्बा हो और जब मुसीबतों को एकजुट होकर दूर किया जाए तो ज़िंदगी आसान बन जाती है । क्योंकि :- 

 

मुसीबतें जब किस्तों में आती हैं तो जिंदगी ख़र्च हो जाती है। पर किस्तें भरने वाले हज़ार हो तो वही मुसीबत पल भर में ख़त्म हो जाती है ।।

 

कभी कभी मुझे दूसरों से मदद माँगने में झिझक सी लगती है कि अगर मैंने मदद मांग ली तो पता नहीं वह क्या सोचेंगे लेकिन अब ये झिझक आविष्कार में आने के बाद ख़त्म हो रही है क्योंकि यहाँ हर वक़्त हमें यही बोला जाता कि जितनी भी किसी से मदद ले सकते हो लो, और जितना सीख सकते हैं उतना सीखो और कभी भी किसी को अपने से बड़ा या छोटा मत समझो क्योंकि हम सब बराबर हैं और सब एक ही हैं, जैसा व्यवहार आप दूसरों से करेंगें वैसा ही व्यवहार वह आपसे करेंगें और अंत में मैं बस यही कहना चाहूँगी कि :- 

 

एक रहो एक बनो क्योंकि अनेकता में तो आफ़त है 

जब वही अनेकता एकता बनती है तो एकता में ही सबसे बड़ी  ताक़त है।