Rebooting the System.


Its been two months at AAVISHKAAR and I can definitely say that time travels at the speed of light. I was not even able to realize that its two months of the roller coaster ride which runs on a new track every day with an utmost speed it can.

Last 6 years of my life have been in a concrete jungle.. oops i mean in a city and then this sudden change of climate, atmosphere and no robot culture where life is not all about work rather it is lived and enjoyed with so many energetic people around.

But those all jammed parts of life needed a lubrication, needs to be refurbished and then restarted, and I found a lot of difficulty to make it work which initially was helped by the natural substance of this place and then I started working on my schedule which used to be sleep late at night and get up mostly in the afternoon, but here at AAVISHKAAR my day starts at 6 am and ends at 5:30 pm.

Sharp shifting to this change was very sudden for me but this shift in the schedule helped me a lot to be more productive when I started beginning my day a little early say 6 am, the beautiful sunrise here fills me with a very high amount of energy and which directly helped me to be productive throughout the day. Although I was not efficient enough in the work which was handed over to me but the work culture here and all the mates kept helping me in completing my work. I belong to that society of the world where we work as a robots, I mean ‘Engineers’ 🙂 where we just see that there is a problem and we need to fix it and I was brought up with the same mindset of given a target and hit the same.

Here at AAVISHKAAR we have to mostly explore and learn with a lot of diversity in people. I work with people with Maths, Botany, Education and Economics background and all those taught me that life is not all about revolving around targets, it is much more than that.

Sometimes, we can learn a lot from other ways also and the best learning always happen when we do Self-learning and Self-exploration which helps us to get a lot more broader perspective and to think and work in many different ways and this was also taught to me by the Ganit charcha’s that I attended that its ok and perfect to have different views and solution. Initially, when I started teaching in classes I did not believe in the detailed planning of the class, i just had a overall rough plan with a few lines written in my lesson plan and used to go to the classes directly and take the classes which resulted in a not so good and exciting class neither for the kids nor me, I used to think that I have solved so many engineering problems and it will be very easy to teach kids but that misconception of mine was broken on the second class itself which I took, I got blanked what to teach next, I had enough time left with me in that class and then Babli (my co- fellow) took charge and helped to take the class forward, that was the day that I realized that teaching cannot be taken as trivial. It need rigorous planning and visualizing stuffs, this was the first time I came out of my mind set and started thinking about other things which I need to change in me and within past few days our program manager conducted a Fellow meet in which her agenda was to discuss on the Stereotype mind set we have and in day to day life we are so stereotype even in decision making, that also made me realized that how I unconsciously made decisions by being so stereotype and I analysed myself and the people at AAVISHKAAR helped me a lot in some way or the other.

Either by direct means like saying me directly that you should reflect on your classes else by letting me do my stuff and learn from the experience. These are the changes which I am learning in this Aavishkaar fellowship journey and I’m really very lucky that at a very early stage in my life I am able to experience so much of learning in a space of a vast cultural diversity also from the various life taught lessons and a lot of things which we ignore unconsciously in our lives which play a vital role in our life when we deal with people across the globe. I hope that this roller coaster ride has some new and exciting twist and turns ahead in my fellowship journey, I hope that I’ll take a lot from AAVISHKAAR in the forth coming days…..

Sanjay (Aavishkaar Fellow).

पाई साइकिल कैम्प..

“कैम्प” का नाम सुनकर ऐसा लगता है कि सिर्फ़ मौज़ मस्ती और बस यही, बाक़ी और कुछ भी नहीं लेकिन कभी ये नही सुना था कि मौज़ मस्ती के साथ पढ़ाई। हम पढ़ाई का नाम सुनते ही ऐसे डर जाते हैं जैसे पता नहीं क्या बोझ पड़ गया हमारे सिर पर। लेकिन यहाँ पढ़ाई का मतलब सिर्फ पढ़ाई नहीं है या किसी चीज़ को रटना मात्र नही है  इसका मतलब है “सीखना”। कुछ इस तरीक़े से या इस तरह से सीखना और इतनी सरल भाषा में सीखना कि जो सब को समझ आए और हम किसी को भी सरल तरीक़े से समझा पाएँ। उसको अपने हाथों से प्रयोग कर के बता पाएं। 

आविष्कार में जिस तरीक़े से और जितने सरल शब्दों का इस्तेमाल करके हमें सिखाया या बताया जाता है वैसे ही मैं भी कोशिश करती हूँ कि जब भी स्कूल में जाऊँ, जो भी बच्चों को सिखाऊँ वह इतने सरल शब्दों में हो कि हर बच्चे को समझ आए । क्योंकि :-

शब्दों में जितनी ताक़त होगी ,उतनी सरलता उनको समझने में होगी, वरना आवाज़ तो हर कोई ऊँची कर सकता है।

वैसे भी जितने धीमे से बारिश होती है, उतने ख़ूबसूरत फूल खिलते हैं।

तूफान तो सब कुछ बहा कर ले जाता है ।।

कैम्प में आए हुए बच्चे यह सब देख कर कोशिश करते हैं कि जितनी सरल भाषा में उन्हें बताया जा रहा है वह भी सरल से सरल शब्दों में जवाब दें। 

यहाँ आकर हर एक बच्चा सोचता है कि वह अपने दोस्त के साथ रहे कोई भी किसी दूसरे के साथ नहीं रहना चाहता। लेकिन इन सब के साथ हम बच्चों को सिर्फ अपने दोस्तों के साथ ही नहीं रहने दे सकते क्योंकि सब अलग अलग जगह से आते हैं। तो हमारी यह भी सोच होती है कि यहाँ आए सभी बच्चे एक दूसरे के दोस्त बने सब एक दूसरे को समझे ताकि कभी भी ज़िंदगी में उन्हें अपने परिवार से या अपने दोस्तों से दूर अकेला रहना पड़े तो उस परिस्थिति में वह नए दोस्त बना सकें।

बच्चों के साथ रहते रहते मैंने भी बहुत कुछ सीख लिया । सुनने में बहुत बड़ा शब्द है ” ज़िम्मेदारी “

सुन के ही डर सा लगता है जैसे पता नही कितना बड़ा बोझ डाल दिया है किसी ने हमारे सिर पर। किसी के मुँह से सुन ले कि आपको कोई काम करना है और इसको पूरा करने की ज़िम्मेदारी आपकी है तो हम डर जाते हैं। अक्सर हमें अपनी ज़िंदगी में जिम्मेदारियों से बड़ी शिकायतें रहती हैं। मैं किसी भी छोटी छोटी ज़िम्मेदारियों से डर जाती थी लेकिन अगर सोचा जाए तो जब तक हमारी ज़िंदगी में कोई ज़िम्मेदारी ना हो तब तक हम सही रास्ते में जा ही नहीं सकते ठीक उसी तरह जिस तरह एक पतंग को उसकी डोर से अलग कर दिया जाए तो कभी वह अपनी सही दिशा में जा ही नहीं सकती।

अगर हमें किसी चीज़ की ज़िम्मेदारी दी जाती है तो पता नहीं क्यों दिल डर सा जाता है कि हम इसे पूरा कर भी पाएँगे की नहीं । लेकिन जब वह ज़िम्मेदारी हम दिल से निभाते हैं और उसे पूरा करते हैं तो उसे पूरा करने के बाद एक अलग ही सुकून मिलता है । 

अभी कुछ दिन पहले मैं काफ़ी बच्चों के साथ रही एक तरह से बोले तो उनको संभालने की कहीं न कहीं मेरी भी ज़िम्मेदारी थी मैं दिन रात उनके साथ रही। बच्चे थे तो शरारतें तो साथ में होंगी ही हमेशा और छोटे बड़े सभी बच्चे थे तो मन घबरा गया था कि पता नहीं मैं संभाल भी पाऊँगी या नहीं पर इन सब के बीच मे उनसे सीखने को भी बहुत कुछ मिला । देश के अलग अलग कोने से बच्चे आते हैं और उन सब के रहन – सहन के तरीक़े भी एक दूसरे से अलैदा होते हैं । बहुत  छोटे- छोटे बच्चे आते हैं, कुछ तो ऐसे होते हैं जो पहली बार घर से इतनी दूर अपने माँ – बाप को छोड़ कर आए हैं पर फिर भी वह कुछ सीखना चाहते हैं कुछ करना चाहते हैं इसलिए घर से इतनी दूर अपने माँ – बाप से दूर यहाँ आते हैं चाहे कुछ दिन के लिए ही पर उनमें सीखने का ज़ज़्बा है तब भी वह बच्चे होने के बावजूद यहाँ इतनी दूर आने का क़दम उठाते हैं।

किसी के लिए यह बहुत छोटी बात हो सकती है बच्चों को संभालना लेकिन मेरे लिए यह पहली बार था तो मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात थी । धीरे-धीरे मैं बहुत कुछ सीखने लगी हूँ । मेरी ज़िंदगी में कभी ऐसे पल नहीं आए ना मैंने कुछ किया लेकिन अब मौक़ा मिला है तो मैं इसे ऐसे ही गँवाना नहीं चाहती कुछ तो अपनी ज़िंदगी में करना चाहती हूँ। यहाँ आकर इतना तो लक्ष्य बन गया है कि अगर :-

ज़िंदगी में आए हैं तो कुछ करके ही जाना है ।


हल्ला गुल्ला..


एक आर्दश कक्षा कैसी होनी चाहिए?


इस साधारण से प्रशन ने मुझको बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया और मुझे क्या पता था कि यह प्रशन  मुझको भी अपने बचपन के विद्यार्थी जीवन के आसाधारण बातों से रुबरु करवा देगा। 


अभी तक हम अपनी शिक्षा की कढ़ाई में जितने भी तेल मसाले डालकर उसको बेहतर करने के जितने भी नुस्ख़े देते रहें है उसमें अलग-अलग प्रकार से कक्षाओं के विवरण देते रहे हैं। मगर उसमें यह बात सामने आती रहीं है कि कक्षा को और बेहतर कैसे किया जा सकता हैं जिससे छात्रों के अधिगम स्तर में और वृद्धि लाई जा सके। इसके लिए समय-समय पर भिन्न-भिन्न प्रकार की आदर्श कक्षा की रूपरेखा की संरचना होती रहती हैं जिसमें यह सवाल बार बार दोहराते हुए सामने आता रहता हैं कि “एक आदर्श कक्षा कैसी होनी चाहिए”

जब हम एक आदर्श कक्षा की बात करते हैं जिसमें एक शिक्षक अपने ज्ञान की लौ से बाक़ी के दीयों को प्रज्वलित कर रहा हैं।

मगर शायद हमको अपने इस आदर्श कक्षा के सवाल को और स्पष्ट करने की आवश्यकता हो जाती हैं कि आदर्श कक्षा किसके नज़रिये से छात्रों की या शिक्षकों की। 

यदि शिक्षकों की तरफ से देखें तो आदर्श कक्षा वो होगी जिसमें बच्चे शांति से बैठे रहें और शिक्षक के निर्देशों का पालन बिना किसी हल्ले गुल्ले के करते रहें और यदि छात्रों की दृष्टि से देखें तो इसके पूरे विपरीत जिसमें हल्ले गुल्ले के बिना किसी कार्य का आरंभ और अंत नहीं होगा।

इसको एक उदाहरण से समझते हैं,

एक बार जब मैं अपनी कक्षा की ओर जा रहा था तब किसी दूसरी कक्षा में भाषा पढ़ाती हुई एक शिक्षिका ने बच्चों को बोला अगर तुमने कक्षा में बोला या शोर मचाया तो मैं तुमको और पढ़ाऊंगी। 

मेरे मन में ख्याल आया की यदि भाषा पढ़ाना हैं तो बच्चों को बोलना तो पड़ेगा ही। और फिर हल्ला गुल्ला तो होगा ही।

उसी प्रकार यदि विज्ञान सीखाना हैं तो प्रयोग करवाना तो अनिवार्य हैं और प्रयोग के दौरान छात्रों की जिज्ञासा, प्रयोग के दौरान सभी प्रकार की होनी अनहोनी पर तमाम सवाल और विचार तो सामने आएंगे ही और जहाँ विचार आएंगे वहां मतभेद भी हो सकता हैं। मतभेद जहाँ हैं वहाँ हल्ला-गुल्ला तो स्वाभाविक ही हैं।

एक शिक्षक को अपनी कक्षा के संचालन के दौरान हल्ले-गुल्ले पर पूरा नियंत्रण रखने की आवश्यकता तो है ही क्योंकि यह छात्र की भागीदारी तो सुनिश्चित करता ही हैं उसके साथ छात्रों में उमंग की धारा छोड़ता हैं जिसकी असीम ताक़त कभी भी नियंत्रण से बाहर होने पर कक्षा में अव्यवस्था भी फैला सकती हैं।

इसलिए एक शिक्षक को बारीक़ी से मगर नियमित रूप से अपने कक्षा के हल्ले गुल्ले को नियंत्रण में रखने का प्रयास करते रहना चाहिए।

ऐसा कभी नहीं हो सकता कि किसी हल्ले-गुल्ले के बिना कक्षा का संचालन हो सके। यह तो एक चरण हैं अधिगम का जिसके बिना छात्र की उत्सुकता और उनकी समझ को भांप पाना मुश्किल हैं।

यक़ीन नहीं होगा मगर करना पड़ेगा अपनी फेलोशिप के इस  महीने का अनुभव अपने ब्लॉग के द्वारा करने वाला भी कभी बच्चा था। जो कभी स्कूल भी जाता था और जहाँ तक लगता हैं कि आज के सब बड़े लोग भी कभी बच्चे रहे होंगे। मगर जब बड़े हुए तो फिर हल्ला गुल्ला छोड़ सिर्फ बड़ों की तरह सोचने लगे। 

शुभम कुशवाहा

Sparkling minds of tiny tots!


I have recently started exploring – Elementary Math Teaching. Though I am a graduate from IIT Mumbai in CSE, but my heart is always into education. So, I don’t have a corporate job experience, but have taught Science to middle schoolers for more than 5 years. The start-up I founded  and ran for 7 years was also around creating Board Games which allowed learning to happen seamlessly. I continue to work in this field and lately Maths has become by area of interest. So, here I was playing some Math games/activities which the Aavishkaar team introduced to me.  It took me sometime before I realized what was going on with my son(4 yrs) and nephew (5 yrs) during these activities.


My son liked counting things but often won’t tag the number and the things properly. The Ganit Mala with 200 beads, gave such a real life problem for counting, something he could touch and the quantity was large and the string made sure double counting was not happening. We used to count in the head earlier by saying the number loudly.


It took him a while to figure out the pattern that after 29 comes 30…he kept asking me what comes after 39, 49, 59, and caught up the pattern from 69…he said 70 himself. Earlier, I never got this idea of putting actual 200 things for him to count, so he can figure out the boundaries like 19, 29,…99 etc while actually counting, he can literally see the pattern here. Interestingly after reaching 100…he started counting 0,1,2,3 …and refused to say 101, 102….!


Well it took a day for him to accept that there are numbers after 100 🙂

As for my nephew, who has been introduced to multiplication and knows all the tables, was counting 1 2 3 4…when I showed him 4 dots in the 10 frames activity. I added one more dot and asked them how many dots…and he said 5. When I asked how did you arrive at it? He said he counted them. When I asked the younger one..he said 5 …and he explained 2, 2 and you added 1 more, so 5! My nephew also got the hang of finding a pattern..and started using it when I added one more dot. 6, 3+3 came the answer from him.

Madhumita 1
10 Frame Activity.

Ganit Mala games with my older one too gave so many opportunities for finding a number….he was forced to break a number into friendly numbers.


It was working like a charm.

What I liked about the approach Aavishkaar has towards Maths, it helped me build a REAL view of Maths, Earlier it seemed to be in books only. Here not only was it REAL but I was able to help these 2 boys build this REAL view of Maths in such a short time.


A blog by Madhumita.




Nov 2, 2019, Time 0600 hrs:  As I boarded the bus from Chandigarh the exploration began. The scenic view on the way to Palampur was very fascinating, butterflies started tickling inside my stomach and I was unable to wait for the clock to strike 1400 hrs, I kept on checking google maps how much distance is left, then finally at 1430 hrs I reached Palampur and the next very movement I called Danish that I have reached.

Danish & Shubham came to pick me up we shared greetings and then we went to pick other co-fellows of Aavishkaar – Babli, Shreya, Aanchal, Divyanshu & Shamli. Starting from Palampur on the way to Aavishkaar campus I kept quiet since the excitement was at its peak to enter the campus which I explored in Google maps. I met the Aavishkaar team Rita, Trilok and few whom I already met on the way to Kandwari. 1600 hrs a small introductory meet was organized for me where we revealed some funny incidents of our life, some more chit chats & end of the day. As the sun started setting down the snow-covered mountains of Dhauladhar range of Himalayas caught my attention, it was glooming reddish in color from the light of the setting sun, this was the first time I was experiencing a clear sky and gazing stars on a cold chilly night and waiting for the sun to rise for next day to continue my exploration.


Aavishkaar’s Exploration:


Next morning started with the warmth & welcoming attitude of people in a very cold place. Especially Sarit sir and Sandhya ma’am “the techies” but so down to earth that no one can say they lived in the states for a couple of years. “AAVISHKAAR: CENTRE OF SCIENCE, MATHS, ARTS & TECHNOLOGY” as per the name Aavishkaar is the storehouse of ideas and concepts in a mud house named “Library” where we work, the place where ideas emerge and sessions are conducted and every time every individual unlearn and then learn and we (fellows) are here to unlearn- learn – teach some excited and enthusiastic kids. Everything here in Aavishkaar is that which we’ll feel like we know but then later on when we have to teach in a layman language we get stuck and that’s why we first unlearn – learn. 

Sarit sir’s theories and Sandhya ma’am’s Ganit Charchas are always fascinating where we learn everything in a way that if we have to teach our “Dadi” then even she gets a good understanding of the concept. Past one and a half months at Aavishkaar was like a very new roller coaster ride which was full of new learning’s, bonding, observation of class of co-fellows and the scenic view of the place, where every morning fills an individual with positivity and to create a change and I enjoy the sunrise that fills me up with a lot of energy for the whole day and the chilly nights over here. 

On the 7th day of my fellowship, there was a Workshop scheduled “Hamaari Shikshaa” from which I learnt a lot of new things and with different views of every participant and how we can create a change in Education system of India. In the workshop, we learnt a lot about how the Indian Education system is governed who are the stakeholders and how the policies are designed which included a lot of different types of tasks in which we all the Aavishkaar team collaborated and worked with the participants and bonded with them. 

All this while in my few initial days at Aavishkaar I made 2 really good friends my roommates “ShubhamNaam hai Humara’ and “DivyanshuPapa se panga nahi’ with these two and the co-fellows all the other members of Aavishkaar, I never missed my home, I always felt like it is just my Dad and Mom had gone out on a vacation.

And then a couple of weeks after “Hamaari Shikshaa” the moment came when I have to start a new class at Government Primary School – Kandbari and I was very nervous to teach small kids of 3rd, 4th & 5th grade but then Sandhya ma’am and especially co-fellow Babli the expert in teaching young “kids” supported and backed me every time, I just lost control in my first class. I remember an incident where I was teaching number sense and then I just got blanked while teaching reverse counting and suddenly Babli took the charge of the class and helped me to maintain the flow of the class and everyday she helped me in planning for my class. The kids to whom I teach are also very excited and some of them are so fast learners that to keep them excited I have to always think of something new and take that to my class. 

While taking my class, whenever I get a chance of going to DGL nunnery with Sarit sir and Shreya I accompany them and  kids of nunnery are so disciplined and so energetic, the way they think of whatever Shreya teaches them is always fascinating every time I go there I learn something from the kids the patterns they see in Ganit Charcha of dots which we never thought of and the most important thing that I learnt from all the classes that I have observed yet of my co-fellows and myself is that we adults always complicate things and get stuck but on the other hand kids just do everything in a simplified manner. 

Here in Aavishkaar, we have an Engineer not by degree but by knowledge, experienced and talented, whose problem-solving methodology is as simple as kids. He is Roshan Lal Bhaiji the man with high caliber but down to earth. He invited all the members of Aavishkaar to his place for dinner and his family is also same as like him, we all experienced hospitality with simplicity at its best. 

I being an engineer, always enjoy his company, he shares a lot of things to me, I share some experiences with him which I had in my college and I take up a lot of practical doubts to him, he solves them so quickly and I hope an engineer is going to learn a lot at Aavishkaar under the guidance of so many talented, young and energetic people……. Let’s see what I’m going to learn next …………….


Sanjay – Aavishkaar Fellow.

एक कुशाग्रबुद्ध शिक्षक की कक्षा।


शिक्षक हूँ! अनुभवों से सीखता हूँ, 

चाहे अपने हों या दूसरों के, 

कुछ अच्छा लगता हैं,

तो मैं रख लेता हूँ।


एक शिक्षक का जब नाम लेते हैं तो मन में सबसे पहले जो छवि उभर कर आती है वह एक ज्ञानी व्यक्ति  विशेष, तो कभी छड़ी लिए हाथ में किसी व्यक्ति की बन जाती हैं। मगर किसी व्यक्ति विशेष को केवल उसके विषय ज्ञान के भंडार के आधार पर शिक्षक के पैमाने पर आंकना या समझ लेना शायद थोड़ा ग़लत हो सकता हैं।

एक शिक्षक का विषय ज्ञान उसकी सबसे बड़ी करामति ताक़त तो हैं ही मगर उस ताक़त का किस प्रकार से इस्तेमाल किया जाए जिससे वह अपनी कक्षा के संचालन के दौरान छात्रों को उचित ज्ञान तो दे ही सके उसके साथ वह उस कक्षा के परिवेश को भी नियमित व्यवस्थित करता रहे। जिससे अधिगम का एक उच्चतम स्तर बना रहे।

इस उच्चतम स्तर को बनाने के लिए एक शिक्षक का विद्वान होना तो आवश्यक हैं ही उसके साथ-साथ बदलती हुई इस आधुनिक दुनिया में एक शिक्षक का तीव्रबुद्धि या कुशाग्रबुद्ध होना भी उतना ही आवश्यक हो जाता हैं।

कुशाग्र शिक्षक से अभिप्राय एक चतुर शिक्षक से हैं जो कक्षा के परिवेश को भांप कर अपनी शिक्षण रणनीति बदलता तो रहता ही हैं उसके साथ-साथ छात्रों को उपयुक्त दिशा निर्देश द्वारा उनकी भागीदारी भी नियमित रूप से बढ़ा घटा के अधिगम करवाता रहता हैं।

इस माह में अवसर प्राप्त हुआ ऐसे ही कुछ कुशाग्र शिक्षकों की कक्षा में जाने का। जहाँ अलग-अलग शिक्षकों की कक्षा के संचालन की प्रक्रिया तो देखी ही उसके साथ भिन्न-भिन्न प्रकार की तरक़ीबों से भी परिचित होने का अवसर प्राप्त हुआ।

“शिक्षिका जो छात्रों को दिमाग लगाने पर मजबूर कर देती हैं”।

एक शिक्षिका ऐसी भी मिली जो अपने कक्षा में पढ़ाते समय प्रश्नों की झड़ी को इस तरह लगाती थी कि छात्रों की रुचि कभी खो नहीं पाती थी और छात्र पढ़ते हुए ऊब भी न जाए इस बात का भी अनुमान वो भली भांति लगा लिया करती थी। दरअसल वह प्रश्नों को पूछने के सफर को कुछ आसानी से मुश्क़िलात की तरफ इस तरह ले जाया करती थी की छात्रों को इसका बोध भी नहीं हो पाता था और वह अपनी जिज्ञासा को कभी खो नहीं पाते थे। इससे छात्रों की बौद्धिक स्तर का विकास भी नियमित रूप से बना रहता था।

” ग़लतियों को जशन मनाना सीखो”।

ग़लती! किसी भी काम में ग़लती हो सकती है यह एक ऐसा शब्द और एक ऐसी चीज़ है जो आने वाले क़दम को ठहरा देती हैं और चलते हुए कारवां को रोक देती हैं, मगर कक्षा में यदि इस चीज़ का जशन मनाया जाए तो बहुत कुछ सीखा भी देती हैं। शिक्षक को प्रत्येक छात्र को ग़लती करने पर प्रोत्साहित करते रहना चाहिए और एक दिन ख़ुद वह छात्र अपनी ग़लती को सही कर लेने में सक्षम हो जाएगा।

कक्षा में पढ़ाते समय अक्सर देखने को यह बात मिल ही जाती हैं यदि कोई छात्र ग़लती करता है या उससे पूछे गए सवाल का जवाब ग़लत होता है तो ऐसे में उसका पूरी कक्षा में मज़ाक बनता है और वह शर्मिंदगी से शराबोर होकर फिर कभी उत्तर देने की चेष्टा नहीं कर पाता मगर यदि एक कुशाग्र शिक्षक कक्षा में हो तो वह उसके ग़लत जवाब को भी किसी और संदर्भ में सही बताते हुए उसे अगली बार जवाब देने के लिए प्रोतसाहित कर ही देता हैं।

“जो आलस्य भी चालाकी से करता हो”।

एक अच्छा शिक्षक आलस्य भी चालाकी से करता है, वो तरीक़ा अपनाता है की शिक्षण सामग्री को बच्चों के समूह बनाकर सही तरीक़े से बाँट दे। सही समूह से तात्पर्य प्रत्येक छात्र को इस तरह से समूह में पिरोया जाए जिससे वह मिलकर काम कर सकें और उसके इस्तेमाल का सही निर्देशन देकर अपना काम सरल बना ले। फिर बस उसको घूम-घूम कर देखना होगा कि सब समूह सही-सही और मिलकर काम कर रहे हैं या नहीं अर्थात फैसिलिटेट करने तक ही अपना काम सीमित रखे।

क्या एक समझदार शिक्षक वह है जिसके पास सारा ज्ञान का भंडार है? अपनी इस परिभाषा को मैं आज बदलकर एक नई समझ देता हूँ “जो नए-नए हत्कन्डो से शिक्षण को सहज सरल कर दे वह एक समझदर शिक्षक हैं” जिसके लिए वह अपने अहंकार से परे दूसरे की कक्षा को देखे महसूस करे और उसको अपनी कक्षा में अपनाए वह एक समझदार शिक्षक है।

इस महीने ऐसे ही कुशाग्र शिक्षकों की कक्षा को देख बहुत सीखा जो अच्छा लगा, उसको अपने शिक्षण के थैले में रख लिया और इस्तेमाल कर लिया। ऐसे पैंतरे शायद किसी किताब में मिलें न मिलें या कोई बताए या न बताए, मगर सिर्फ अपने साथियों की कक्षा को देख उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला।

इसको करने के लिए कुछ अधिक कठिनाईयों का सामना भी नहीं करना पड़ा बस अपने चश्मे को उतार कर कक्षा को नंगी आंखों से देखने भर का समय लगा। ऐसा कोई भी यदि करे तो फिर वह ऐसे-ऐसे पैंतरे सीख लेगा जो शिक्षण प्रक्रिया को और लचीला बना देने में सहायक हैं।

सभी को कामयाबी अच्छी लगती हैं। हम सब कामयाब होना चाहते हैं और एक शिक्षक की कामयाबी -असल कामयाबी तब बनती हैं जब उसका विद्यार्थी कामयाब होता हैं। एक विद्यार्थी को कामयाब बनाने के लिए इतनी नाकामियों से उसकी परीक्षा लेने के लिए शिक्षक को थोड़ा तो तीव्रबुद्धि बनना पड़ेगा। उसको उसकी ग़लतियों से परिचित भी करवाना पड़ेगा एवं  और ग़लतियाँ वह करे, उससे सीखे इसके लिए भी उसको प्रोत्साहित करते रहना पड़ेगा।


शुभम – आविष्कार फेलो।


Sketch of Education- My first hand experience.


It has been one month and a few days. I have travelled to four states in search of some purpose. I work with Aavishkaar-non profit in Kandwari, Palampur, H.P. Aavishkaar promotes STEM education through a different framework, fundamental and critical understanding for the students who will be citizens of tomorrow. We emphasize students’ understanding so that the student’s finding becomes a developing concept while designing their curriculum. This will help intervene learning, designing and innovating. Rewiring process is developed so that students do not complain about the hardships that they face while studying abstract cogitation such as mathematics and physical sciences.

Division method by the students which help them understand that division is not just an operation but an activity that can be done with logic and fun. understanding the basics of the subject is important.


Aavishkaar also conducts student and teacher’s workshops. Recently, I attended a teacher workshop ‘Hamaari Shikshaa’. Potential educators and learners were invited from across the country to join the enriching session about education. My knowledge of education in development sector was very limited. It had no figures and data to see what was the condition of India in terms of its education landscape. Aavishkaar hosted the program, all the members of Aavishkaar family joined their hands together to start this session.

The group and discussions.

It was November 9th, 2019- many unknown faces could teach me about education. All I knew about education was that it’s the manifestation of perfection that already exists in any human (rightfully quoting Vivekananda). Still, my aim and purpose in this area was not clear, but I knew I wanted to pave change in my society and to understand its needs in education. As the day proceeded, I visualized education’s law and it’s formulation. It is rightfully ours but we are ignorant of its usage. But I was a little unhappy and thoughts were wandering around- ‘what have I done’. The picture of education became broader when people in this field shared their knowledge and their approaches. Again I was perplexed when my group mates were not ready to accept the reality of society- the caste system which might prove a hindrance to education. In the morning where we spoke about the difference between education and literacy but concepts were in a debate in the evening- where we started behaving as uneducated yet literate people. I was taken aback by the sentiment of nonacceptance. Caste system in education in India is very prevalent. A person from a lower caste doesn’t get an education as teachers or other students do not let them feel safe and secure in that environment. If I wasn’t part of this particular exercise, I would not have known what was the sentiment of educators from urban society about the caste system in education.
10th November started fresh- once again we were introduced to education policies, ASER and some educational tools. ASER results pointed out the structure and finely tuned sketch of education of India. My senses became aware of facts and number, education landscape was never eroded( keeping in mind that we are not talking of quality education) it is just beginning its course. 


I became excited and I had a quench for more information. Satiety is not the key to human evolution-knowledge, power and progress become ultimate to our thought process.


Reflection and recapitulation of the previous day proved crucial to me when one of the group members shared his thoughts from the previous day,  to quote Aditya Ji ( one of our elderly learners adapted this from Veer Zara- a Bollywood movie)


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