“लक्ष्य, कुछ करने का”

आज तक के अपने अनुभव से मैंने सीखा कि जरूरी नही है कि ज़िंदगी में कुछ करने के लिए या कुछ हासिल करने के लिए हमें शुरुआत से ही अपना “लक्ष्य” बनाना चाहिए या हमारे पास हमारा लक्ष्य होना चाहिए । हाँ यह बिल्कुल सही बात है कि अगर हम अपनी ज़िंदगी में कुछ सोच के चले कि हमें यह हासिल करना है तो हम उस लक्ष्य के पीछे भागते हैं और उसको पाने के लिए हम उस रास्ते पर चल पड़ते हैं जहाँ उसके पूरे होने की संभावना दिखे ।

लक्ष्य ही सब कुछ है इंसान को इस ग़लतफ़हमी में भी तो नहीं रहना चाहिए । अगर किसी के पास कोई लक्ष्य नहीं है इसका मतलब यह नहीं कि वह अपनी ज़िंदगी में कुछ कर ही नहीं सकता ।

लक्ष्य का रास्ता हमें उसी की दुनिया दिखाता है जो हमने सोचा है जो हमने देखा है लेकिन ज़िंदगी में कुछ करने का रास्ता हमें सब कुछ दिखाता है जो हमने सोचा भी ना हो । यह रास्ता हमें मज़बूत बनाता है । तो जिनके पास अपना लक्ष्य नहीं है वह जीवन में रुके न चलते रहें हमें अपनी मंज़िल अवश्य मिलेगी ।

 अगर हम इतना सोच के भी चले कि हमें अपनी ज़िंदगी में कुछ करना है पता नहीं क्या करना है लेकिन हम  इस “कुछ करने ” के पीछे भी भागे तो भी हम ज़िंदगी में कुछ हासिल कर सकते हैं । हमें हमारा लक्ष्य अपने पीछे भगाता है और हम उसके पीछे पीछे भागते हैं । यहाँ हम वही सीखते हैं जो उसके रास्ते में सीखने को मिलता है ।

मेरा यहाँ पर बोलने का यह मतलब नहीं है कि लक्ष्य बनाना ग़लत है । सब के पास अपनी ज़िंदगी का एक लक्ष्य होना ज़रूरी है, कुछ करने का लक्ष्य। लेकिन कई बार हम यह सोच कर भी कुछ नहीं कर पाते क्योंकि हमारे पास तो अपना लक्ष्य है ही नहीं हम तो कुछ कर ही नहीं सकते । इस कुछ कर ही नहीं सकते की जगह ये सोचो कि हम कुछ कर सकते हैं और यही हमारा सबसे बड़ा लक्ष्य है ।

अगर लक्ष्य ज़िंदगी संवारता है तो 

बिना लक्ष्य के भी ज़िंदगी सँवारी जा सकती है बस उसके लिए हम में कुछ करने का जूनून होना चाहिए , कुछ सीखने का जज़्बा होना चाहिए ।

सोचने मात्र से कुछ नहीं होता यह नहीं कि ज़िंदगी में कुछ करना है बस सोचा है लेकिन उसके लिए कुछ करना नहीं मेहनत नहीं करनी है बस बैठे रहना है फिर तो आपका सोचना ही बेकार है क्योंकि जब तक मेहनत नहीं तब तक कुछ नहीं । कई बार इंसान यह सोच कर चलता है कि कुछ करने से कोई मतलब नहीं जो क़िस्मत में लिखा है वही मिलेगा । हाँ क़िस्मत में जो लिखा है वह मिल कर ही रहेगा लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम बस बैठे रहें कुछ करें ही न। अगर इंसान कुछ करने की ठान ले तो वह अपनी क़िस्मत भी बदल सकता है ।

मेरा कोई लक्ष्य नहीं है मैंने नहीं सोचा है कि मुझे अपनी ज़िंदगी में डॉक्टर बनना है , इंजीनियर बनना है या कुछ ओर । कभी मेरा कोई लक्ष्य ही नहीं था तो इसके चलते मैं भी यह सोचती थी कि मैं अपने जीवन में कुछ कर ही नहीं सकती क्योंकि कोई लक्ष्य ही नहीं है लेकिन धीरे-धीरे मुझे यह पता चला कि मेरा सब से बड़ा लक्ष्य तो यही है कि मुझे अपनी जीवन मे “कुछ करना” है । ऐसे हाथ में हाथ धरे नहीं बैठना है । ऐसी सोच रख के जो भी काम मुझे मिलता है मैं उसे कड़ी मेहनत से पूरी ईमानदारी के साथ करती हूँ और उसमें मिली कामयाबी या सीख मुझे इस बात के लिए हमेशा मज़बूत बनाती है कि ज़िंदगी में कुछ न कुछ करते रहो । और यहाँ ऐसा भी नहीं है कि यह हर जगह हाथ मारने वाला काम है  यह सिर्फ और सिर्फ आप पर निर्भर करता है कि आप अगर उस काम को करने में आपको कामयाबी मिली है या नहीं अगर नहीं तो ऐसा नहीं कि मेरा वह करना ही बेकार था । बेकार कुछ नहीं है बस हम उससे क्या सीखते हैं यह हम पर निर्भर है ।

और इस कुछ करने के पीछे हम बहुत कुछ सीखते हैं । बहुत कुछ ऐसा सीखते हैं जो कभी हमने न देखा होता है और न कभी उसको करने का सोचते हैं । लेकिन जब इस दुनिया में हम कुछ नया सीखते चलते हैं यही नए तरीक़े हमें जिंदगी जीने का मतलब समझाते हैं ।

बस सीखने के जज़्बे को बनाए रखना है 

आज अगर सीखने की होड़ है 

तो कल सीखने की कला होगी ।

ज़िंदगी तो पल पल करबटें बदलती है

पर इस बदलती ज़िंदगी में भी कुछ करने का हौंसला रखना है ।। 

बबली।

बदलती दुनिया में बदलती ज़िंदगी।

 

न जाने इस दुनिया में और मनुष्य की ज़िंदगी में यह कैसा बदलाव आ रहा है , पल पल ज़िंदगी बदल रही है । क्या बोल रही है यह ज़िंदगी की नई दास्तान , कहाँ ले जा रही है ज़िंदगी कोई नहीं जानता।

क्या हमेशा ऐसा ही चलता रहेगा, क्या अब हमेशा इंसान को एक डर में रह के जीना पड़ेगा । सिर्फ इस डर में कि हमें घर से बाहर नहीं निकलना है क्योंकि हम एक बीमारी के संपर्क में आ जाएंगे । कभी कभी सोचती हूँ कि क्या हैं ज़िंदगी, हम आज हैं कल का पता ही नहीं ,क्या हो कल, कौन होगा कौन नहीं । फिर क्यों इंसान इतनी उलझनों में उलझा हुआ है । सब को पता है एक न एक दिन ऐसा आएगा जब हमारे लिए यह सब ख़त्म हो जाएगा । फिर क्यों हम दौड़-भाग कर रहें हैं ।

एक तरफ़ मन सोचता है जब एक दिन ज़िंदगी ही नही रहेगी तो कुछ करके क्या फ़ायदा क्यों हम हर उस चीज़ के पीछे भागते हैं जो हमें ख़ुशी देती है । क्या यह हमारा स्वार्थ है कि हम ज़िंदगी में कुछ करना चाहते है, कुछ मक़ाम हासिल करना चाहते हैं ? क्यों चाहते है यह हम ?

लेकिन फिर दूसरी ही तरफ़ मन करता है कि हमें एक बार ही ज़िंदगी मिली है तो क्यों न इसको अच्छी तरह से जिया जाए। किसी बीमारी किसी वायरस या किसी और मुश्किल की वजह से अपनी पूरी ज़िंदगी रोक दे यह भी तो गवारा नहीं है, क्यों रोके हम ख़ुद को। ऐसे वक्त मे हमे सबसे पहले अपने आप को जानना है अपने लिए कुछ करना है अपनी खुशी के लिए । 

 देखा जाए तो ऐसे वक़्त में इंसान को ख़ुद के लिए कुछ करने का मौक़ा मिला है । चलती फिरती दुनिया में हम उसी दुनिया के हो जाते हैं जिस ने जो कहा हम उस तरफ चल देते हैं लेकिन मेरे लिए यह एक ऐसा वक़्त है जो हमें सिर्फ सो के नहीं गवाना है । इस शांत दुनिया में भी कुछ करके दिखाना है । नहीं सिर्फ़ दूसरों को खुश करने के लिए  बल्कि अपनी ख़ुशी के लिए और अपने लिए कुछ करके दिखाना है ।

 

कभी कभी इंसान अपने बारे में सोचना भूल जाता है 

अपनी हर ख़ुशी भूल जाता है वह दूसरों पर हावी हो जाता है

जो दूसरे करते हैं हम भी वैसा ही करने लगते हैं लेकिन अगर देखो तो हर कोई अपने लिए एक सुपर हीरो है, कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता बस आप जिसमें माहिर हैं वह करो ।

 

बेशक दुनिया रुकी है लेकिन यह देख के हमें रुकना नहीं है । किसी को नहीं पता कि इसके आगे क्या होगा हमारा भविष्य क्या है और जब हमें किसी बात का पता ही नहीं तो उस बात को लेकर हम क्यों दुःखी हों क्यों उस बात का शोक मनाये जो किसी को पता ही नहीं ,क्यों न आज के लिए जिये । जो आज का पल है पहले उस को जी लेते हैं अगर कल की फ़िक्र करने लगे तो हम अपने आज मे जीना भूल जाएंगे  वैसे भी कल किसने देखा है ।

कल कभी नहीं आता जो है सब आज ही है ।।

ख़ुद को रोकना नहीं है बस आगे बढ़ते जाना है और कबीर जी ने कितने ख़ूबसूरत शब्दों मे लिखा है :-

काल करे सो आज कर आज करे सो अब 

पल मे प्रेलय होगी, बहुरि करेगा कब 

ऐसे वक़्त मे भी मैं बहुत से अलग अलग लोगों के साथ जुड़ी  हूँ उनकी कहीं  न कहीं मदद करना, उनसे मदद लेना मेरे लिए बहुत बड़ी बात है ।  मैं अपने आप को बहुत ख़ुशनसीब मानती हूँ कि ऐसे वक़्त मे मुझे भी कुछ करने का मौक़ा मिला है  बच्चों के लिए कुछ करने का मौक़ा मिला है उन्हे ऑनलाइन पढ़ाने का मौक़ा है । आज “इंटरनेट” हर किसी कि इस बदलती ज़िंदगी का हीरो बन गया है 

May 2020
An online class of DGL Nunnery – Palampur.

शायद अगर आज इंटरनेट नही होता तो दुनिया थम सी जाती ऐसे समय मे क्या हालात होते कोई सोच भी नही सकता ।  लेकिन इंटरनेट ने ऐसे वक़्त में इंसान को रुकने नहीं दिया।

जब वक़्त अभी भी वैसा ही चल रहा है तो कोई क्यों रुके , जब हमें पता है वक़्त किसी के लिए रूकने वाला नहीं है तो हम क्यों । वक़्त रूकता तो नहीं है लेकिन बदलता अवश्य है 

वक़्त बदलता है ज़िंदगी के साथ 

ज़िंदगी बदलती है वक़्त के साथ

वक़्त रुकता नहीं है किसी के लिए तो

अब हम बदलेंगे इस बदलती दुनिया के साथ ।।

 चाहे ज़िंदगी में बड़ा मुक़ाम हासिल ना हो, ज़िंदगी में कुछ ज़्यादा ना कर पाए, बड़ा आदमी ना बन पाए तो क्या हुआ लेकिन ज़िंदगी तो बड़ी मिली है तो इसको इस तरह से बदलते हैं, इस तरह से जीते हैं कि जैसे :-

ज़िंदगी हमें नहीं हम ज़िंदगी को मिले हैं ।।

बबली।

एक दास्तां जिसे मैं सिर्फ इंसानों के साथ ही साझा करना चाहता हूं।

 

मैं हमेशा से ही इस प्रश्न का जवाब जानने में काफी दिलचस्पी रखता था कि धरती पर डायनासोर, वनमानुष, सफेद गैंडे या फिर फला-फला पक्षी या जानवर धरती से किस प्रकार विलुप्त हो गये? मुझे उनके बारे में पढ़कर अचम्भा होता था कि क्या वाकई में पहले इतने बड़े-बड़े जीव होते थे? उससे भी ज़्यादा अचंभा उनके विलुप्त होने पर होता है। पर हाल के दिनों को देखकर अब वो सारी बातें अजीब नहीं लगती हैं। 

ऐसी ही एक काल्पनिक कहानी आने वाले कल की…… जो आपके सामने पेश करने की कोशिश करी है मैंने..

सूरज का आकार कुछ बड़ा हो चला है, धरती अब और भी गर्माहट समेटे सूरज के चक्कर लगा रही है। तपती गर्मी को बर्दाश्त कर पाने वाले जीव ही धरती पर बचे हैं। अब हर साल मौसम करवट नही बदलता है कि जब चाहें बारिश, बर्फ-बारी या जमा देने वाली ठंडी पड़ जाए या फिर ओलों की मार पड़ जाए। न, अब ऐसा नही होता। धरती की प्रजातियां अब प्रदूषण का रोना नही रोते, धरती पर रौनक अब ग्यारह मास रहती है, ग्यारह मास!

अब मौसम ठहराव लिए आते हैं। जब वसंत आता तो चारों ओर हरियाली बिखर जाती और चारों ओर ताज़गी, नव जीवन दिखाई पड़ता। हवा, फूलों की सुगंध को छितिज तक फैलाते जाने की कोशिश मे बहती चली जाती। आज भी धरती ख़ुद को फूलों से वैसे ही सजाती जैसे इंसानों के ज़माने मे सजाती थी। पर अब धरती जैसे सच्ची ख़ूबसूरती लिए हुए है, इस पर पनपे जीवन के साथ खुश है।

 

ऐसे ही किसी मन-मोहक वसंत को ‘परछन’ (काल्पनिक) नामक प्रजाति के दो नौजवान इस धरती के रूपों को जानने की उत्सुकता में अपने चारों पैरों पर घर से निकल पड़े हैं। वो एक-दूसरे से बतियाते हुए धुंध को छांटते चले जा रहे थे।

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परछन।

वो बतियाते, “तुमका पता हई कि हम सुने है धरती पा हज़ार साल पहिल दुइ पैरन वालों जानवर राहत हतो।”  दूसरा बोलता, “ऐसो कछु नाई हइ, असल-मा तुम बौरिया गए हो। इन सब मनघडंत बातन काजे न मानौ करौ।” 

यूँ बातों के सिलसिले के साथ उनके चारो क़दम घोड़े के जैसे हवा को चीरते जा रहे थे। और वे अपने सामने असीम वीरान पड़े छितिज को पार करने की कोशिश में आगे चले जा रहे थे। 

इस वीरानता से पार जब वो दोनों पहुंचे तो उनकी आँखों के सामने हरियाली ही हरियाली बिखरी पड़ी थी। उनके कानों मे चिड़ियों की आवाज़ें पहुँच रहीं थी, वो दोनों एक बगीचे में खड़े थे। वे दोनों वहीं ठहर गए, फाख्ता पक्षी की आवाज़ ने जैसे सबकुछ मद्धम कर दिया। थकावट से जो उत्सुकता ठंडी पड़ चुकी थी अब जाग चुकी है, थकावट जा चुकी है और मन शांत हो चुका है। वहीं अबाबील नामक पक्षी जो काले सफेद रंग में बिना बोले ही दोनों का ध्यान आकर्षित कर रहा था। परचनू पक्षी जो आकार मे छोटा और चुलबुला, जब उसपर भोर की लालिमा गिरती तो प्रकाश अपने सातो रंग उजागर कर देता। ऐसी मनोहर छटा देखते-देखते कब दिन चढ़ गया, उन्हें पता ही नही चला। भूख मिटाने को दोनों ने आडू, कैथ के फल खाए तत्पश्चात बगीचे से दोनो नौजवान न चाहते हुए भी आगे चल पड़े।

कुछ दूर चलते ही दोनों परचनों की एक छोटी बस्ती में जा पहुंचे। मुश्किल से 20 घर ही होंगे उस बस्ती में। घर क्या छोटी सी झोपड़ी ही बोलें, जो मिट्टी से बनी है और दो बाँस के खम्म्बों पर टिके फूस के छप्पर के सहारे टिकी हैं। दोनो ही नौजवान वहां के लोगो से बात करते, उनमें से बस्ती के एक शख्श ने बताया की बस्ती से कुछ दूर पूर्व में गांव के लोगों को कई साल से खुदाई मे तरह तरह तरह के सामान मिल रहे हैं। कभी ईंटें, पहिये, मकान, गाड़ी मिलते तो कभी-कभी पूरे के पूरे घर निकल आते हैं। लोग कहते हैं की देवता ज़मीन में रहते हैं, जब उनकी कृपा होती है तो ज़मीन से अच्छा समान मिलता है। जब देवता नाराज़ होते हैं तो हड्डी के कंकाल हमे देते हैं। क्योंकि खुदाई में दो पैर वाले जानवर निकलते हैं इसलिए कुछ लोगों का कहना हैं कि हज़ार साल पहले धरती पर दो पैर वाला जानवर रहता था, उसे इंसान बोला जाता था। 

 

लोग बोलते हैं कि उसने अपने अंतिम समय पर बहुत तबाही मचाई थी। वो हर चीज़ से छेड़छाड़ करने लगा था। नदियों पर अपनी मनमानी कर उन्हें मोड़ देता, जमीन को खोद-खोद कर बर्बाद कर अपना काम निकलवाता, उसने पहाड़ों, जंगलों को काट डाला, नदियों को गंदा कर बर्बाद कर डाला। वो जानवरों, पक्षियों की ज़िन्दगी में दखल करता था, उनके शरीर के साथ खिलवाड़ करता, उनके अंगों से अपने इस्तेमाल की चीजें बनाता। सभी उससे तंग आ गए थे, यहां तक कि धरती भी। मौसम चक्र बिगड़ चुका था, धरती गर्म होने लगी थी, उसने धरती की आसमानी चादर (ओज़ोन) मे गड्ढा कर दिया था। कई पक्षी, जीव-जंतुओं की प्रजातियां विलुप्त हो गईं। जो पक्षी उस गर्माहट मे ख़ुद को ढाल पाए, वो बच गए। उनमें से एक हम लोग हैं। देखो अपने को, मुश्किल से ही बाल के अंदर की मोटी खाल दिख पाती है, वहीं इंसान की किताबों में देखो तो उसके बाल ही कहा होते थे। 

उनमे से एक नौजवान बोला, “इंसान ये सब करता था! हम लोगों से पहले इंसान धरती पर रहते थे, जो मर गए! पर वो मरे कैसे, ऐसा क्या हुआ था?”

बताता हूँ। सुना है कि धरती उन्हें समय-समय पर चेतावनी देती रहती थी। कभी सुनामी तो कभी बाढ़, भूकंप, हिमस्खलन आदि के माध्यम से। पर वे सभी इंसान आपसी होड़ में इसे नज़रअंदाज़ करते रहे और एक अंधी दौड़ में दौड़ते रहे। उस दौड़ का आयोजन उन्होंने खुद ही किया था। इस आयोजन में आयोजक और प्रतिभागी सभी इस दौड़ का हिस्सा थे। 

जैसे आज हम लोग उस दो पैरों वाले जानवर ( इंसान) को ज़मीन से खोद कर निकालते हैं फिर उनका अध्ययन करते हैं। वैसे ही इंसानों की किताबों से पता चला है कि वो भी एक बड़े जीव डायनासोर (जो इंसान से पहले विलुप्त हुए थे) को ज़मीन से खोदकर उनपर अध्ययन करता था।  

हमारी बस्ती के विशेषज्ञ बताते हैं कि इंसान काफी समझदार था, उसने नई-नई तकनीकें विकसित की तथा कई समस्याओं का निदान कर अपनी ज़िंदगी आसान कर ली। वो साफ हवा को छूकर बहुत खुश हो जाता था।

“क्या, हवा को छूकर खुश हो जाता था?”, एक नौजवान ने पूछा। पर क्यों?

शायद उसने अधिकतर जगह की हवा को गंदा कर दिया था। इस कारण साफ हवा को छूकर वो खुश होता था।  फिर उसने अपनी ज़िंदगी को और भी आसान करने के लालच मे धरती की अन्य प्रजातियों के जीवन मे दखल करने लगा, जो उसे ले डूबा।

एक रोज़ एक विचित्र बीमारी धरती पर पनपी जिसने पूरी इंसानी प्रजाति को हिला डाला। इस बीमारी का इलाज इंसानों के पास नही था। इस कारण इंसानों को एक दूसरे से मिलना जुलना छोड़ना पड़ा। उसने कुछ महीने अपने-अपने घरों में रहकर ज़िंदगी बिताई। अपने बड़े-बड़े आशियाने, जिन्हें उन्होंने अपना पूरा जीवन लगाकर बनाया था,  उनमे उन्हें घुटन होने लगी थी। कई इंसानों को इस दौरान धरती के साथ अपनी की गई ग़लतियों का एहसास हुआ था। उन्होंने आगे से अंधी दौड़ का हिस्सा न बनने का संकल्प लिया। पर ये संख्या बहुत कम थी, ढेरों इंसान अब भी थे जो पैसे का मोह छोड़ नही पाए थे। वे अब भी अपने व्यवसाय में ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा चाहते थे। इस बीमारी के थोड़ा सा कम होने पर इंसान फिर उस दौड़ में लग गए……। 

दूसरा नौजवान बोला, “फिर क्या हुआ इंसानों का।”

बस्ती का आदमी उन दोनों नौजवान से बोला, “अगर वो होते तो मैं तुम्हें ये कहानी नही सुना रहा होता।…….

 

पर मैं ‘एक इंसान’, तहे दिल से चाहता हूं कि आप जीवित रहो।

आप जीवित रहो इस धरती को ख़ूबसूरत बनाने के लिए, 

अपनी आने वाली पीढ़ियों को इस धरती को ख़ूबसूरत बनाने का मौका देने के लिये, इसे जीने के लिए। 

 

आप जीवित रहो इस कहानी के जैसे आने वाली सभी कहानियों को पढ़ने के लिए, 

इस ब्रह्मांड के रहस्यों का पता लगाने के लिए।

आप जीवित रहो अपनी आने वाली पीढ़ियों को इस ख़ूबसूरत होती जा रही धरती के सौंदर्य को देखने के लिए।

 

आप जीवित रहो…….

तो आज हम इंसानों की दुनिया ऐसी कगार पर पहुंच गई है जहां लोग दुकान जाकर अपनी ज़रूरत का सामान खरीदने से भी कतरा रहे हैं, लोग घर से निकल नही सकते, एक दूसरे से मिल नही सकते, लोग घुट रहे हैं अपने ही खूबसूरत आशियाने मे। पर क्या हम फिर से आज़ाद हो सकेंगे।

 

मुझे उम्मीद है आपके (इंसानों) सहयोग से सब ठीक हो जाएगा। मुझे पता है कि आप मेरी इस बेतुकी सी कहानी को परछनों के हाथ लगने से बचाओगे। इस काल्पनिक कहानी को ग़लत साबित करने मे आप मेरी मदद करोगे।

 

आपसे अपरिचित इंसान 

दिव्यांशु।

कोरोना को ख़त।

 

प्रिय कोरोना,

तुम हो तो ख़राब और बहुत कुछ ख़राब ही करा है, हर तरफ तुम्हारा ख़ौफ़ का साया है। सारी दुनिया को तुमने थमा सा दिया हैं मगर तुम फिर भी मेरे लिए प्रिय ही रहोगे वो इसलिए नहीं कि तुम्हारे आने से प्रकृति में फैले कार्बन उत्सर्जन द्वारा प्रदूषण में कुछ सुधार हुआ हैं वो इसलिए की तुम्हारे आने से हमने आगे बढ़ने और सीखने का एक और नया माध्यम ढूंढ निकाला हैं।

कोरोना जी, आपकी वजह से तकलीफें तो बहुत हो रही हैं कुछ मानसिक तौर पर तो कुछ तनाव की व्यस्तता की शिकस्त में तो आ ही जाता हूँ पर उसके निवारण के लिए ख़ुद को किसी न किसी तरह शारीरिक रूप से व्यस्त करने की कोशिश भी कर ही लेते हैं। अपने कैंपस में एक बूमररेंग को उछाल-उछाल उसके पीछे लगने वाले विज्ञान को पढ़ने समझने की भी कोशिश करते-करते समय व्यतीत करा है, और यक़ीन मानो बूमररेंग का इतिहास और भौतिक विज्ञान बहुत ही दुर्लभ हैं इस बात का भी अभी हाल ही में पता चला हैं।

तुमको थोड़ा बता दूं कि तुमसे डर कर बाहर निकलना बंद कर दिया हैं और अब तुम्हारी इस कठोरता की वजह से आलस्य का हर पैमाना भर आया है। मगर कुछ अच्छा ये भी हुआ है कि अपनी कुछ अच्छी आदतों की बदौलत घर में पड़े-पड़े कुछ सीख लेता हूँ।

आपने इस ख़त में कुछ शुक्रिया इंटरनेट का भी करना चाऊँगा। जिसने हमें मुश्किल परिस्थितियों में भी बैंडविड्थ कमज़ोर होने के बावजूद एक दूसरे से हमको जोड़े रखा।

सच में इंटरनेट एक चमत्कारी चीज़ हैं ये आज इसने साबित कर ही दिया क्योंकि इसने हमारी सीखने की चाहत को कभी रुकने नहीं दिया। लोगों से मिलना बंद हुआ मगर उनसे जुड़ना बंद नहीं हुआ। ऑनलाइन वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से गणित पर चर्चा और विज्ञान के पहलुओं पर बहस अभी भी चलती जा रही है।

तुम्हारे बढ़ने के गणित को धीरे-धीरे समझने की कोशिश करी तो अच्छा लगा और पता भी चला कि तुम्हारा बढ़ने का गणित दो जमा दो या दो गुणा दो की सीमा के कई मीलों दूर तक तेज़ी से फैलने वाला घातांक निकला।

तुमको घटाना या भाग करने के लिए हमने जिस गणित 14 दिन के क्वारंटाइन का उपयोग किया है उसने काफी कुछ सीखा दिया हैं। जिसका उपयोग मैं तुम्हारे जाने के बाद भी करता रहूँगा।

अंत में कोरोना जी आपसे बस इतना ही अनुरोध है कि आप अभी तो होना पर प्लीज़ कल न होना।

 

धन्यवाद कोरोना

तुम्हारी छत्र छाया से दूर रहने का प्रयास करने वाला

शुभम (आविष्कार फेलो)

अदृश्य दोस्त या दुश्मन।

सुना था “ज़िंदगी करवट बदलती है” और आज देख भी लिया । ऐसे तो हर इंसान सब कुछ चाह कर , सोच समझ कर करता है फिर उसकी ज़िंदगी में ऐसा क्यों होता है कि ना चाहते हुए भी उसे वह करना पड़ता है जो वह कभी नहीं चाहता । चाहे कोई कुछ भी कर ले कितनी भी ऊंचाईयां हासिल कर ले,  कितना भी इस दुनिया के बारे जान ले लेकिन अगले ही पल में क्या हो जाए यह कोई भी नहीं जानता। यह तो कभी किसी ने नहीं सोचा होगा कि हमारी ज़िन्दगी में कोई एक दिन ऐसा आएगा जब हम सब का घर से निकलना बंद हो जाएगा हम अपने दोस्त, मित्रों से नहीं मिल सकेंगे और वह भी अपने जीवन की सुरक्षा के लिए हमसे नहीं मिल पाएंगे । कुछ दिन पहले पूरी दुनिया अस्त – व्यस्त थी हर कोई अपनी ही दुनिया में खुश था । फिर एक दम से सब कुछ बदल गया ।

एकवायरस”, जो ना दिखने वाली चीज़” है , इस ना दिखने वाली चीज़ ने पूरी दुनिया को हिला के रख दिया अचानक सब कुछ शांत कर दिया। 

पर वास्तव में इसको हम बोले ही क्या शांति बोले या अशांति क्योंकि शांति तो तब होती ना जब हर कोई ख़ुशी से अपने घरों में बैठा होता लेकिन ख़ुश तो कोई भी नहीं फिर यह कैसी शांति । इस वायरस ने  सब के अंदर एक डर सा जगा दिया है कि क्या कभी यह ख़त्म भी होगा या नहीं ,क्या मनुष्य की ज़िंदगी पूरी तरह बदलने वाली है। क्या बदल देगी एक ऐसी चीज़ इस धरती के तौर तरीक़े जो कि दिखाई ही नही देती। 

इस वायरस पर कुछ पंक्तियां :- 

सुना है तू किसी जानवर से निकल कर आया है 

पूरी दुनिया में मनुष्य के लिए अशांति लाया है,

तुमसे लड़ा भी जाए तो कैसे

तू तो एक अदृश्य शत्रु बनकर आया है,

किसने सोचा था एक दिन एक वायरस आएगा 

सब की आज़ादी छीन ले जाएगा,

मनुष्य के लिए यमराज बन के तू आया है 

प्रकृति की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया है,

क्या समझें तुम्हें अपना दुश्मन ,या प्रकृति का दोस्त

दोनों ही तरफ तुमने बराबर हाथ बढ़ाया है,

 कहीं किसी को तुमने उनके परिवार से मिलाया है 

तो कहीं किसी को अपने परिवार से दूर करवाया है ।

अगर हम ध्यान से देखें तो इस “वायरस” ने प्रकृति को एक अलग ही उपहार प्रदान किया है कभी यह नहीं सोचा था कि धरती का प्रदूषण कभी कम हो पाएगा बस यह निरंतर बढ़ता ही जा रहा था । इस प्रदूषण की समस्या से प्रकृति की सुंदरता धीरे धीरे छिन रही थी,  लेकिन जब से इस वायरस की वजह से सब बंद करवाया गया है मनुष्य को घर के अंदर रहने को कहा गया है तब से प्रकृति हस्ती खिलती दिखाई दी है बेशक वहाँ मनुष्य की चहल-पहल नहीं है  परंतु इससे जानवर को बहुत फ़ायदा पहुंचा है । आज उसे किसी मनुष्य या शिकारी का डर नहीं है वह निडर होकर जंगलों में घूम रहा है । 

यह सब देख कर समझ नहीं आ रहा कि हम इस वायरस को अपना दोस्त समझे या दुश्मन क्योंकि एक तरफ यह मनुष्य की जान के लिए खतरनाक है इससे हजारों मासूमों की जान जा रही है  तो दूसरी ही तरफ़ यह प्रकृति का दोस्त बन कर आया है, जानवरों के लिए आज़ादी लाया है। 

इस चलती फिरती दुनिया मे इन्सान रिश्तों की महत्ता को भूल गया है  लेकिन आज देखें तो मनुष्य अपने घरों में बंद अपने परिवार के साथ वक़्त बिता रहा है और दूसरी ही तरफ कुछ लोग इस “वायरस” से फैली बीमारी से जूझ रहे हैं और कुछ लोग इसके चलते अपनी जान से हाथ धो बैठे । इस “वायरस” ने दुनिया को थाम के तो रख दिया लेकिन उसे रोक नहीं पाई । इस चलते सनाटे में भी हर कोई कहीं ना कहीं अपने अपने काम में लगा है ।आज मनुष्य ने दिखा दिया है कि :-

ज़िंदगी तुमसे चाहे कितनी भी रूठ जाए 

तुम अपने कर्तव्य से मत रूठो

बस अपने हौसले को बना के रखो 

एक न एक दिन तुम्हें सफलता मिलेगी।

इसने मनुष्य को यह दिखा दिया है कि चाहे हम कितनी भी कामयाबी हासिल कर लें कितना कुछ भी कर लें लेकिन जीवन से बढ़ कर कुछ भी नहीं है अगर जीवन नहीं तो कुछ भी नहीं । अब हमें अपने जीवन को बचाना है चाहे हम इससे ना लड़ सकें लेकिन इससे बचा तो जा सकता है । दुनिया के सभी चिकत्सक अपनी जान को हथेली में रख कर इसके इलाज़ में जुटे हैं  हम भी कहीं ना कहीं अपने घरों में सुरक्षित बैठ कर उनकी मदद कर सकते हैं ।

 यह जो वक़्त मिला है यह बहुत क़ीमती है इसे ऐसे ही ज़ाया नहीं करना है, अपनी ज़िंदगी को बदलने के लिए उसे समझना है।

वक़्त अपना है, सिर्फ़ सोने में नहीं गुज़ारना है, इसे सोने जैसा बनाना है।

बबली।

Mapping the World of School Mathematics

The fascinating world of mathematics offers its friendship to most of us in our school years. It’s another matter that it feels a bit too crushing and many of us decide not to extend that hand of friendship again. Here is an attempt to share the landscape of Maths that we explore in those school years. With this big picture in mind, we may be able to help each other, as well as our students, to become better friends with Mathematics, and to become better thinkers.

Maths is introduced like a spiraling ladder, more exciting concepts are revealed as we go up. The foundation pillars we build are –

  1. Number System – An introduction to the digits of mathematics, with which we construct many numbers, large and small. Unlike words in languages, any combination of digits will make sense in Math. We explore numbers that are whole and add directionality to them; investigate numbers that are fractured and learn different ways of representing them, and even study numbers that we can never measure.
  2. Operations – Combining the numbers to display an idea through a mathematical expression or statement. We learn to join, remove and compare numbers, learn how many times something is added or removed, and learn to express relationships between several quantities.
  3. Basic Geometry – Defining and describing the geographical space in the world around us.
  4. Measurement – Defining basic parameters of quantifying, and the units we can use to measure them in, by developing a common language.
  5. Basic Algebra – Finding patterns around us, creating new patterns and developing the ability to predict by understanding the patterns. Studying the repeating as well as growing patterns and writing mathematical codes for them.

These components help us understand the language of mathematics on which we build ahead –

  1. Statistics – Study of data around us and conclusions that we can make from them.
  2. Probability – Study of predicting the future and the confidence in the computed outcome.
  3. Trigonometry – Applying geometry and measurement to understand spaces through the simplest polygon, the triangle.

Here is a concept map showing the landscape of school mathematics.

Math concept map 09 full

Brownian Motion – An Experimental Investigation.

Shamli Manasvi, April 2020

The Particle Theory of Things, is –

Everything can be broken down into smaller particles (analysis view). In other words, everything is made up of small particles (synthesis view). These particles have two fundamental properties –

  1. They are in constant random motion,
  2. And they all attract each other.

But, really? I’m not buying this without any evidence.

Here is some supporting evidence for the claim made in statement 1 of the Particle Theory of Things (see video below).

The Video –What you see in the video, is footage of milk under a microscope at about ×1000 magnification. The milk has been mixed with a little bit of green dye, to be able to see the particles better. The large particles are clusters of fat molecules, that are embedded in water (space between fat globules) to form a suspension that we see as milk. The motion we are discussing here, is the jiggling of each of the milk particles (Brownian Motion). Try to imagine the water as being made up of millions tiny water particles (they are too small to be seen even under a microscope), that are moving all around, and bombarding the milk particles, which causes the Brownian Motion.

Sizes table

The Story –Today, this seems simple. But like everything else, it has a story behind it. The understanding of this motion has taken hundreds of years to become what it is today. Here is some of its history –

Jan Ingenhousz in 1785, and Robert Brown in 1827, described this peculiar, random, jiggling motion of large particles, as seen under a microscope. Ingenhousz was observing coal dust particles, while Brown was studying pollen grains. They were puzzled by this unusual jiggling movements; Brown even suggested that these particles might be alive.

brownian motion simulation gif (2)

Almost 80 years later in 1905, this motion was modeled mathematically, by Albert Einstein. What Einstein calculated, and thus showed, was that these larger particles (pollen, dust etc.) are not themselves the source of the motion, they are embedded in a sea of much smaller water particles. These water particles, he imagined, are moving continuously and randomly. The pollen or dust grains are being bombarded by the water particles from all sides. The imbalance in the bombardment results in the jiggling of the grains.

This explanation was convincing evidence that even though we cannot see them, atoms and molecules exist.

पढ़ना, साझा करना, चर्चा करना।

मैं हमेशा से ही ऐसी चर्चाओं का हिस्सा होना चाहता था, जिसमे सभी अपनी बात रखें और फिर एक निष्कर्ष पर पहुंचे जो सभी के लिए लाभदायक हो। ऐसी छोटी सभायेँ जहां पर लोग किसी महत्वपूर्ण विषय पर अपने विचार रखें उनका आदान प्रदान करें।

बहुत सी किताबों मे पड़ा था की किस तरह से कोई इंसान छोटी सभाओं मे हिस्सा लिया करता था, या फिर अपनी मित्र मंडली के साथ गुफ्तगू करके उसने अपनी जिंदगी को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दुनिया के कई समाजवादी नेताओं, वैज्ञानिकों, कवियों में और भी परिपक्वता आई जब वो ऐसी सभाओं का हिस्सा हुये जिसमे वो अपने विचारों को साझा करते थे। उन पर चर्चा करते, उन्हे और भी परिपक्व बनाते जो ख़ुद के और दूसरे के विकास के लिए लाभकारी होती। 

समाज-वादियों द्वारा एक कमरे मे बैठकर सामाजिक ख़ामियाँ पर चर्चा करना या फिर कई साहित्य पसंद लोगों का नुक्कड़ की दुकान पर चर्चा करना उनकी जिंदगी मे काफी उपयुक्त रहा। आप एक ऐसी जगह की कल्पना तो करो जहां पर आप अपने साथियों के साथ बैठकर अपने विचार साझा करते हो। जहाँ आप पक्ष, विपक्ष दोनों का सामना करना सीखते हो। बात करते वक़्त आप विपक्ष का सामना शांत रहकर करना सीखते हो। शीर्षक जिसके बारे मे आप जानकारी रखते हो और दूसरे उसे सुनते हैं, उसके बाद अपने तर्क से प्रश्न करते हैं। आप अपने तर्क से कोशिश करते हो उनके प्रश्नों का जवाब देने की, दूसरे भी अपने विचार रखते हैं। ऐसी जगह जहाँ सिर्फ जवाब देने की बात ही नही है, दूसरे उस तथ्य पर कैसे सोचते हैं, चिन्तन- मंथन, तर्क का ये सिलसिला चलता है। हो सकता है सभी बातें ठीक न हो पर उसमे से कुछ बातें ज़रूर आपकी समझ मे बढ़ोतरी तो करेंगी ही साथ ही साथ आप के विचारों मे मज़बूती भी लाएंगी।

हर गुरूवार को हम सब साथ मे बैठकर एक किताब को पढ़कर उस पर चर्चा करते हैं। इस ‘बुक रीडिंग इवैंट’ को सुनियोजित तरीक़े से आयोजित करने की ज़िम्मेदारी मेरी ही थी। मैं अपनी तरफ से पूरी तैयारी के साथ जाता था। सच कहूँ तो इस बुक रीडिंग इवैंट से मुझे काफी लाभ मिला। न केवल विषयात्मक ज्ञान नहीं बल्कि व्यावहारिक ज्ञान भी।

इस दौरान हमने तरह तरह के लेख, किताबें पढ़ी। किसी किताब ने विषयात्मक ज्ञान बढ़ाया तो किसी ने दार्शनिक बात को समझने के तज़ुर्बे दिए तो अन्य ने शब्दों, तर्किक शक्ति को और भी सशक्त बनाया। 

ऐसी ही एक किताब है, दिवास्वन। एक ऐसी किताब जो शिक्षा मे बदलाव के लिए उठाए गए क़दमों के बारे मे बताती है, किस तरह से गीजू भाई एक सरकारी विद्यालय की एक कक्षा मे बदलाव लाए। किस तरह से उन्होने व्यक्तिगत विकास के योगदान के लिए क़दम उठाए। जैसे कि दिन-भर मे बच्चों ने जो कुछ किया उसको कॉपी मे लिखना, हर एक दिन के बारे मे लिखना। जिस लक्ष्य की ओर जाना चाह रहे हैं उसमे क्या परेशानियाँ आ रहीं हैं, उनको दूर करने के लिए सही क़दम उठाने का साहस रखना। ये बातें मुझे इस उपन्यास को पढ़कर पता चलीं।

दिवास्वप्न के बाद हमने (होप फ़ॉर दा फ्लावर्स) ‘आशा के फूल’ नामक किताब पड़ी। जोकि एक कीट पर केन्द्रित थी, जो ये बताना चाहती थी कि ज़रूरी नही कि दुनिया मे जो कुछ भी दूसरे लोग कर रहे हैं तुम भी वैसा ही करो। हो सकता है तुम एक नए रास्ते कि खोज करो, ऐसी जो शायद और भी महत्वपूर्ण हो। एक कीट के तितली बनने की कहानी, जो भीड़ का हिस्सा बनकर किसी काल्पनिक ऊंचाई पर नही जाना चाहता था। इसे पढ़ने के दौरान हम लेखक द्वारा दिये गए तर्क पर अपने अपने मत रखते थे। कई बार हम लेखक से असहमत भी होते। प्रश्न भी उठते कि क्या उस आदमी का जीवन व्यर्थ है जो किसी ऐसी दिशा मे जा रहा है जिसे किसी अन्य ने बताया है और उसने अपनी आँखों से भी देखा है कि इस रास्ते पर जाने से उसे उसका मन-चाहा लक्ष्य मिलेगा। तब किसी अन्य द्वारा बताया गया रास्ता कैसे व्यर्थ हो सकता है।

ऐसे ही एक अन्य उपन्यास हमने पड़ा था जिसका नाम था लिटल प्रिंस यह भी एक कल्पना पर आधारित उपन्यास है। जिसमे कि एक बच्चा दूसरे ग्रह पर पहुँच जाता है। वहाँ पहुँच कर परिस्थितियां किस तरह से बदलती हैं। और हमने ही अपने आसपास ऐसे बेवजेह के नियम कानून बना रखे हैं जिसका कोई अस्तित्व ही नही होना चाहिए था। ये एक ऐसी पुस्तक थी जो दार्शनिकता से भरी पड़ी थी, इसे दोबारा पड़ने की ज़रूरत थी।

समय बीतता गया और इस बुक रीडिंग अभियान मे बदलाव भी आने लगे। नाम बदलकर ‘पड़ना, साझा करना, चर्चा करना’ हो गया। हम अब एक किताब पर चर्चा करने के बजाय सभी लोग एक छोटा सा लेख पढ़कर आते और उसे साझा करते। हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का 10 मिनट का समय मिलता। उस दौरान हम उससे प्रश्न करते, एक दूसरे के साथ चर्चा करते। उस बात को मानने से पहले तर्क करते तब उस बात को हम मानते। इस दौरान हमने कई विषयों पर अपनी समझ बेहतर की जैसे कि हमारे शरीर के सूक्ष्म-जीव, विज्ञान पर अविश्वास, तथ्यों पर अविश्वास, हम पेट्रोल का इस्तेमाल ही क्यूँ करते हैं गाड़ी मे, ऐसी बहुत सी बातों पर समझ बेहतर हुई।

इतना सब कुछ होने के बाद हमे इतना विश्वास तो हो ही गया है कि किताब मे लिखी गई हर बात सही नही होती। मैंने कई बार देखा कि लेखक कई दफ़ा बातों को घूमा देता है, फिर कैसे भी अपनी बात सिद्ध करने की कोशिश करता। ऐसे तर्क जिनका कोई अर्थ ही नही बनता। जैसे कि एक लेख जिसका नाम ‘हर कण मे राम हैं’। इस बात को सिद्ध करने के लिए लेखक ने गणित का इस्तेमाल किया। उसने एक समीकरण में कोई भी सख्यां रख कर 2 शेष-फल को दिखाया। चूंकि राम शब्द मे दो शब्द ही हैं इसलिए हर जगह राम पा ये जाते हैं। ऐसी बातें जिनमे बेवजह तर्क लगाकर अपनी बात को मनवाया जाता है, इस बात पर मेरा विश्वास और भी पुख्ता कर देती हैं कि किताब में लिखी हुई हर बात सच नही होती।

असंतुलित भाषा।

मैं हिंदी भाषी हूँ!

पढ़ता हूँ! लिखता हूँ! बात करता हूँ! 

और यहाँ तक की सोचता भी इसी भाषा में ही हूँ।

क्योंकि……

मैं हिंदी भाषी हूँ!

 

अपने को अभिव्यक्त करने के लिए इसी को माध्यम बनाया है। अपनी बात अच्छे से कर पाता हूँ, पूरी स्पष्टता से अपनी बात को समझा भी पाता हूँ। क़िस्से कहानी, कविता तमाम इसी में रच पाता हूँ,

मैं हिंदी भाषी हूँ!

आगे आप जो कुछ पड़ेंगे वो मेरी(एक हिंदी भाषी) की कहानी हैं जो अनुभव से आई हैं।

“अगर आप मेरी तरह सोचने वालों में से हैं तो यह ज़रूर सोच रहे होंगे की हिंदी भाषी हो तो क्या मज़ाक बना अब तक या नहीं”। मैं इसका जवाब दूंगा। हाँ, पहले बनता था लेकिन अब नहीं।

मज़ाक तो बना मगर अब ऐसी जगह हूँ जहाँ मेरी इस क़ाबलियत को सराहा गया और बताया गया कि ये कमज़ोरी नहीं ताक़त हैं। जिसका प्रदर्शन भी करना कुछ हद तक सीख चुका हूँ। वो ऐसे, की हर महीने अपने अनुभवों को ब्लॉग के माध्यम से आप तक अपनी बात को पहुंचने में सक्षम जो हो पाया हूँ। मगर अपनी इस ख़ूबी पर घमंड करना सही तो हैं मगर इतना भी नहीं की उसी में या उतने तक ही सीमित रह जाऊँ। 

इसकी समझ मैंने ऐसे बनाई,

एक भाषा चाहे कोई भी हो वो एक संस्कृति समाज को दर्शाती हैं, जिसमें छुपी उसकी भावना और उसकी सभ्यता का उपन्यास का लेखा-झोखा होता हैं। केवल अपने या एक ही लेखे-झोखे तक ही ख़ुद को बांध कर रख लेना शायद ग़लत हो सकता हैं। ऐसा होने से किसी और संस्कृति का आचरण अपने तक न आ पाने और दो संस्कृतियों के संगम से होने वाले अमृत मंथन के रसपान से वंचित कर देने जैसी संभावना को बना देता हैं।

और स्पष्टता मुझको कुछ इस तरह समझ आई….

जैसे इस माह आविष्कार में गैबी नाम की एक शोधकर्ता का आना हुआ। जो किसी अन्य संस्कृति अर्थात भाषा की थी। उनके आने का मक़सद विज्ञान की असीम ताक़तों से हमको परिचित करवाना था। जो कुछ भी उन्होंने अपने समाज में रहते हुए शोध किए हो, उनको दूसरे समाज के साथ साझा करना था।

अब दो विविध संस्कृतियों के बीच उठे इस क़दम में आदान-प्रदान द्वारा शिक्षा की और बेहतरी पर पहल करनी थी। पहल करने की बात तो हो चुकी थी मगर इसको संभव करने के लिए दोनों संस्कृतियों के बीच बातचीत होनी ज़रूरी थी।

असल परेशानी तो अब शुरू हुई……

मैं ठहरा हिंदी भाषी जिसको हिंदी के अलावा कोई और भाषा समझ में नहीं आती थी उसी प्रकार गैबी को भी अंग्रेजी भाषा के अलावा कोई और भाषा समझ में नहीं आती थी। यह मेरे लिए बहुत ही असमंजस की बात रही क्योंकि बिना बात कोई आदान-प्रदान संभव कैसे हो सके।

इस भाषा के अवरोध ने मुझे मेरी ज़िंदगी का एक महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाया। जिसने मुझे मेरे छोटे से घोंसले से बाहर आने पर ज़ोर दिया। मैं अपनी हिंदी भाषा में इतना विलुप्त था कि अंग्रेज़ी भाषा सीखने पर कभी सोचा ही नहीं, कभी सोचा ही नहीं कि इसकी ज़रूरत क्या हो सकती हैं या इससे मेरे जीवन में और क्या अवसर खुल सकते हैं।

कोशिशें काफी की अपनी तरफ से और मेरे साथ सिखाने वालों का भी सहयोग बहुत मिला जिसकी बदौलत दो संस्कृति के मिलन से एक शिक्षण का विषय तैयार हो पाया। जिसका शीर्षक “सुक्षमजीव: एक अदृश्य दुनिया” रखा गया। इस विषय को मैं अपनी और कुछ अन्य लोगों की कक्षाओं में लेकर गया जहाँ इस विषय को बहुत ही पसंद किया गया और पढ़ाने की विधि को वहाँ के शिक्षकों ने सराहा भी।

अपनी भाषा पर घमंड करना अच्छा हैं मगर इतना भी नहीं कि बस उसी तक सीमित रहो। दुनिया में और भी बहुत सी चीजें हैं जिनसे हम अनजान हैं। उसको जानने के लिए जिज्ञासा होना तो ज़रूरी हैं ही मगर उससे परिचित होने के लिए अपने आराम के क्षेत्र की बेड़ियों को तोड़ उससे बाहर आने का प्रयत्न भी करना होगा।

कल्पना।

अगर देखा जाए तो इस दुनिया मे जो कुछ भी होता है सब ‘काल्पनिक’ है जो भी हम करते हैं जो कुछ भी हो रहा है सब कुछ, चाहे वह हमारी असली ज़िंदगी से वाक़िफ़ हो या फिर कोई पुरानी मिथ्य। अभी कुछ दिन पहले मैंने एक लेख पड़ा था जो की इसी बात पर था कि हम किसी चीज के बारे मे सुन लेते हैं या किसी ने वह कर के दिखा दिया तो हम उसको सच मानने लगते हैं लेकिन क्या उस चीज को हम इस दुनिया के हर कोने मे करें तो वह बिलकुल वैसा ही होगा, यह हम कैसे बता सकते हैं जबकि हमे इतना पता है कि हमे इस दुनिया का हर कोना ही नही पता और हम वहाँ जा भी सकते हैं या नही, तो इसे हम सिर्फ मान लेते हैं कि हाँ ऐसा होता होगा। 

बचपन से हम हर चीज़ की कल्पना ही तो करते आए हैं जैसे मैं कोई कहानी सुनती थी तो उस कहानी से मैं ख़ुद को जोड़ती थी कि वहाँ पर मैं हूँ और ऐसा सब कुछ मेरे साथ हो रहा है । सबसे पहले हम किसी चीज़ की कल्पना करने लगते हैं और फिर उसको वैसा ही मानने लगते हैं । 

जैसे अभी मैं जो भी लिख रही हूँ वह भी तो काल्पनिक है क्योंकि यह सब जो लिख रही हूँ जो भी यह शब्द हैं यह भी तो किसी ने बनाए हैं तो इन्हे बनाने मे भी तो किसी ने सबसे पहले कल्पना की होगी फिर अक्षर बनाए और सब ने मान लिया है कि किस शब्द को क्या बोलना है कहाँ उसका इस्तेमाल करना है बस फिर इस तरीक़े से सब ने मान लिया तो वह चल पड़ता है ।

जैसे विज्ञान को हम विज्ञान क्यों बोलते हैं क्योंकि सिर्फ इसलिए कि किसी ने वह नाम दे दिया है और हम उसे मान रहे हैं क्या हमने कभी यह जानने की कोशिश की कि किसी चीज़ को या किसी बात को हम इतनी आसानी से क्यों मान लेते हैं, कम से कम हमे उस बात की पुष्टि तो करनी चाहिए की ऐसा वास्तव मे क्यों हो रहा है, हो सकता है की हम उस बात के अंतिम चरण तक न पहुंचे पर कम से कम उस बात पर चर्चा तो कर सकते हैं और हर किसी का जवाब जानने के बाद या प्रयोग करने के बाद अगर वह सच साबित होता है तब हम उस चीज को मान लेते हैं, जैसे आजतक मैंने सुना है कि धरती सूर्य के चारों ओर घूमती है और सूर्य स्थिर है लेकिन आजतक देखा तो नहीं है और ना ही यह महसूस किया है कि हम धरती पर हैं तो हम घूम रहे हैं लेकिन सच तो है ना कि धरती घूमती है और हम सब इस बात को मानते हैं चाहे हमें महसूस हो या ना हो।

यह सब बातें आज तक मैंने कभी जानने की कोशिश ही नहीं की कि ऐसा क्यों होता है आज तक बस जिसने जो भी करवाया और जो भी पढ़ाया बस उसको मान लिया कभी भी जानने की कोशिश नहीं की। शायद इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि वैसा हमे किसी ने सिखाया ही नही की हम सवाल करें या अपनी बात आगे रखें। 

आज तक यह सोच बनी ही नहीं कि मैं किसी के सामने कोई सवाल करूँ बस हर चीज़ को सोच लेना कि ऐसा होता है, पर इस सब में ऐसा बिलकुल नहीं है कि किसी ने रोका या करने नही दिया लेकिन माहौल ही ऐसा था, न कभी किसी ने बोला न कभी मैंने किया।

फिर इसके बाद मेरा रहना उन लोगों के साथ हुआ जो कभी ऐसी बातों को मानने के लिए बिलकुल तैयार ही नहीं थे कि किसी ने कोई बात बोल दी और उन्होने वह बात मान ली उनको उस बात का प्रूफ़ तो नही पर कम से कम उस बात पर चर्चा करनी होती है, और सब का मानना है कि विज्ञान तो एक ऐसा विषय है जिस पर जब तक कोई बहस न हो तब तक उसको करने का कोई मतलब ही नहीं है, बेशक विज्ञान हमें अंतिम सत्य तक नहीं पहुँचाएगा लेकिन उस बात को मानने का पूरा प्रूफ़ देता है क्योंकि इसके आगे और कुछ रहता ही नहीं। इसी तरह रहते रहते अब मुझे भी किसी बात को बस मान नहीं लेना है उसको मानने का मुझे भी अब प्रूफ़ चाहिए और बोलते हैं ना कि:-

 

संगत चाहे अच्छी हो या बुरी अगर आप उस संगत में रह रहे हो तो कभी ना कभी आप भी उन्ही की संगत में आ जाते हो अर्थात आप भी वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं ।

तो बस मैं भी ऐसे लोगों की संगति में आ गई जो कल्पना तो करते हैं लेकिन उस को सच तभी मानते हैं जब तक प्रयोग करके न देखें। कल्पना करो लेकिन उस बात को तब तक सच मत मानो जब तक आपके पास उसको सच मानने का सुबूत ना हो ।।

बबली